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Saakhi- परमार्थ एक ऐसी राह | Parmarath- Ek Aisi Raah | Radha Soami Babaji Ki Sakhi Dera Beas

Radha Soami Babaji ki Sakhi Dera Beas 2021

Saakhi- परमार्थ एक ऐसी राह


एक इंसान के पास बहुत धन संपत्ति, बहुत बड़ी हवेली ओर नौकर-चाकर थे। पर फिर भी उस के मन में शांति नहीं थी। वह अमीर आदमी एक साधु के पास गया और उन्हें प्रणाम करके बोला, महाराज! मेरे पास पैसे की कोई कमी नहीं है। पर मेरा मन बहुत अशांत रहता है, आप कुछ ऐसा उपाय बताएं कि मेरी सारी अशांति दूर हो जाए। 

साधू ने सेठ जी से पूछा कि क्या तुम सचमुच शाँति पाना चाहते हो? तो मैं जो भी कहूँगा, वो तुम्हें चुपचाप मानना पड़ेगा। सेठ जी ने फौरन सिर झुका कर मँज़ूर कर लिया, उस साधू ने सेठ जी को बाहर सख्त धूप में बैठा दिया और स्वयं अपनी कुटिया के अंदर छाँव में जाकर चैन से बैठ गए। गर्मी के दिन थे, सेठ जी का गर्मी से बहुत बुरा हाल हो गया। उस को बहुत गुस्सा भी आया, पर वह चुप चाप बैठा रहा। शाम को सेठ को बहुत ही सादा लंगर, सूखी रोटी और दाल खाने को दी गयी। 

दूसरे दिन साधु ने उसे कहा, सेठ जी ‘आज तुम्हें दिन-भर खाने को कुछ नहीं मिलेगा। आज तुम्हारा व्रत है, सेठ ये सुन कर भी चुप चाप रहा। लेकिन भूख के मारे, दिन-भर सेठ के पेट में चूहे कूदते रहे ओर अन्न का एक दाना भी उस के मुँह में नहीं गया था। लेकिन उस ने देखा कि साधु ने उसी के सामने बैठ कर, बड़े आनंद से हलवे पूरी का भोजन किया। 

सेठ सारी रात परेशान रहा, उसे एक पल भी नींद नहीं आई। वह सोचता रहा कि ये साधु तो बड़ा स्वार्थी है, ये मुझे क्या शाँति देगा? तीसरे दिन सवेरे ही उस ने अपना बिस्तर बांधा और चलने को तैयार हो गया। तभी साधु महाराज उस के सामने आ गए और बोले, सेठ जी क्या हुआ? सेठ ने कहा, ‘मैं यहां बड़ी आशा लेकर आपके पास आया था, लेकिन मुझे यहां कुछ नहीं मिला। उल्टा मुझे ऐसी मुसीबतें उठानी पड़ी, जो मैंने जीवन में कभी नहीं उठाई। मैं अभी यहां से जा रहा हूँ, 

यह सुन कर साधु हँस कर बोले। ‘मैंने तुझे इतना ज्ञान दिया, पर तूने कुछ भी ग्रहण नहीं किया। सेठ ने आश्चर्य से साधु की ओर देखा और बोला ‘आपने तो मुझे कुछ भी नहीं दिया।’ साधु ने कहा, ‘सेठ जी पहले दिन जब मैंने तुझे धूप में बैठाया और ख़ुद छाँव में बैठा रहा। तो मैंने तुझे बताया कि मेरी छाँव, तुम्हारे किसी काम नहीं आ सकती। 

जब मेरी बात तुम्हारी समझ में नहीं आई, तो दूसरे दिन मैंने तुझे भूखा रखा और ख़ुद खूब अच्छी तरह हलवे पूरी से खाना खाया। उस से मैंने तुझे समझाया, कि मेरे पकवान खा लेने से भी तुम्हारा पेट नहीं भर सकता। सेठ, याद रखो मेरी साधना से तुझे कुछ नहीं मिलेगा। परमार्थ एक ऐसी राह है, जहां मंजि़ल तक पहुँचने के लिए खुद ही यात्रा करनी पड़ती है। मैं तुझे राह बता सकता हूँ, लेकिन उस राह पर चलना तुझे खुद ही होगा। जैसे धन तूने खुद अपने पुरुषार्थ से कमाया है, वैसे ही शांति भी तुझे अपने ही पुरुषार्थ की कमाई द्वारा ही मिलेगी।’ 

यह सुन कर सेठ की आँखें खुल गई और उसे अपनी मंजिल तक पहुंचने का रास्ता भी मिल गया। *भाई सेठ की आँखें तो खुल गई, लेकिन हमारी आंखें कब खुलेगी। हमें भी एक पुर्ण गुरु मिला हुआ है, क्या हम उस के बताए हुए मार्ग पर चल रहे हैं? क्या हम उस के उपदेश को समझ रहे हैं, नहीं! तो अभी हमारी आँखें बंद ही है। इस लिए इन आँखों को खोलो और महापुरुषो द्वारा बताए गये रास्ते पर चलो। उस मार्ग पर चलते हुये नाम और शब्द की कमाई करो। एक बात याद रखो कि आप को उसी का फल मिलेगा, जो आपके द्वारा की गई कमाई होगी। कोई महापुरुष कितना भी पहुंचा हुया क्यों ना हो? उसकी कमाई उसी को मिलेगी हमें नहीं। हमें तो वही कमाई हासिल होगी, जो हमने भजन सिमरन पर बैठकर की है। अगर हम भजन सिमरन पर बैठे ही नहीं, कुछ कमाया ही नहीं तो हमें हासिल भी कुछ नहीं होगा। हमारे पल्ले कोडियां ही कोडियां रह जाएगी, सत्संग में भी फरमाते हैं कि कोई भी महापुरुष कितना भी पहुंचा हुआ क्यों ना हो। उसका फायदा उनको ही है किसी ओर शिष्य को उस का फायदा नहीं हो सकता जब तक हम अपनी कमाई खुद नहीं करते। इस लिए सब कुछ त्याग कर थोड़ा समय भजन सिमरन और नाम की कमाई पर भी दो समय मत गंवाओ, समय बहुत कीमती है। उठो जागो और बैठक बना कर बैठ जाओ, परमार्थ एक ऐसी राह है जिस पर हमें खुद ही चलना होगा। फिर सब कुछ आसान लगने लगेगा, पर हम शुरूहात तो करो।*


*हउमै करम कमावन्दे*

     *जमडंड लगै तिन आइ,*

*जो सतगुरु सेवन से उबरे*

     *हरि सेती लिव लाइ ।।*


Radha Soami Sangat ji

Apko ye babaji ki sakhi kaisi lagi hamein jrur btayen ji

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Babaji ki sakhi radha soami ji

Maharaj Gurinder Singh Ji Sakhi Hindi font

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