Satsang Dera Beas 16 February 2020। 16 फरवरी का सत्संग

Babaji ka satsang Dera Beas


16 फरवरी 2020 दिन रविवार को डेरा ब्यास में बाबा जी ने तुलसी साहब की बानी “दिल का हुजरा साफ़ कर जाना के आने के लिए” पर प्रातः 9:58 से 11:08 तक (1 घंटा 10 मिनट) सत्संग फ़रमाया । बाबा जी ने सत्संग की शुरुआत में फ़रमाया कि यह तुलसी साहब की बानी है । आपने शेख तकी को समझाने के लिए यह बानी रची है । शेख तकी एक मुसलमान थे और तुलसी साहब हिंदू घराने से संबंधित थे, लेकिन रूहानियत में धर्म से कोई संबंध नहीं होता । तुलसी साहब ने शेख तकी को समझाने के लिए यह ग़ज़ल लिखी और कुरान का हवाला देकर शेख तकी को समझाया । रूहानियत में संबंध सिर्फ प्रेम और प्यार का होता है । हिंदू, मुसलमान, सिख, इसाई - सारी दुनिया का एक ही मालिक है । नाम अलग अलग हो सकते हैं, लेकिन वह मालिक एक है । उस एक ही की भक्ति करनी है । ना वह मंदिर में है, ना मस्जिद में है, ना गुरुद्वारे में, ना कहीं किसी गिरजाघर में है, वह तो हमारे अंदर है ।

आप ने फ़रमाया कि हम जहां उस मालिक को बिठाना चाहते हैं, वह जगह भी तो साफ होनी चाहिए । अगर हमारे घर किसी मेहमान ने आना हो तो किस तरह अपने घर की साफ सफाई करते हैं । हम मालिक को बुलाते तो रहते हैं, लेकिन उसको जहां बिठाना है या जहां पर उसके बैठने की जगह है, क्या वह जगह साफ भी है ? नहीं है । उसको साफ करने की जरूरत है, क्योंकि यह जन्मों जन्मों से मैली हो चुकी है । “जन्म जन्म की इस मन को मल लागी काला होया स्याह”... हम अपने घर और दफ्तर को हर रोज़ साफ़ करते हैं । इस बात का इंतज़ार नहीं करते कि गन्दा होगा, तो ही सफाई करेंगे । रोज़ सफ़ाई करने से जल्दी काम खत्म हो जाता है और मेहनत भी कम लगती है । अगर हम कभी कभी या देर बाद साफ़ करते हैं तो वक़्त और मेहनत, दोनों ज़्यादा लगते हैं । ठीक इसी तरह हमें हर रोज़ भजन सिमरन करके अपने अन्दर की सफ़ाई करनी है, और एक दिन मालिक ज़रुर दया करेंगे और हमारा बर्तन साफ़ हो जाएगा और फिर उसको भरने की ज़िम्मेदारी उसकी है । बाबाजी ने ज़ात पात के बारे में भी बहुत समझाया । बानी में आया है कि “एक पिता एकस के हम बारिक”... फ़िर हम क्यों किसी की जात पूछते हैं और अपने आप को उस परमात्मा से दूर कर लेते हैं ।
आपने फरमाया कि वह मालिक कोई ABSENTEE LANDLORD नहीं है, कि जब हम हैं तभी वहां पर रहेगा, नहीं तो नहीं रहेगा । वह तो हमेशा हर जगह मौजूद है । हमें सिर्फ उसका एहसास होना चाहिए । वह हर वक्त, सदा हमारे संग संग है । हमें उसके भाणे में रहना है, उसके मौज में रहना है । मालिक की भक्ति का जो तरीका मालिक को पसंद है, जब तक उस तरीके के अनुसार हम भक्ति नहीं करेंगे, यानि भजन सिमरन नहीं करेंगे, अंदर से अपनी सुरत को उस शब्द के साथ नहीं जोड़ेंगे, तब तक कुछ भी हासिल होने वाला नहीं । फिर तुलसी साहिब इसी बानी में आगे लिखते हैं कि... “ध्यान ग़ैरों का उठा उसको बिठाने के लिए” । अब यह ग़ैर कौन है ? यह बाल-बच्चे, परिवार, रिश्तेदार, धन दौलत और जो कुछ भी हमें यहाँ इस दुनिया में नज़र आ रहा है, यह सब गैर है, लेकिन इनको ही हम अपना समझ कर बैठे हैं और जिसको हम ग़ैर समझ कर बैठे हैं, वह परमात्मा - वही एक हमारा है । उसके अलावा ना तो हमारा कभी कोई बन सकता है और ना आज तक कभी किसी का कोई बना । संत जन हम भूले भटके जीवों को रास्ता दिखाने के लिए आते हैं । वह सिर्फ़ हमें समझा सकते हैं , हमें सही दिशा बता सकते हैं, लेकिन चलना हमें खुद पड़ेगा । और जब तक हम खुद नहीं करते , हम अपनी मंज़िल तक या लक्ष्य तक नहीं पहुँच सकते । चाहे जितनी मर्ज़ी बार किसी भी डेरे के किसी भी बाबे के पास चले जाओ, किसी ने कुछ नहीं देना जब तक खुद भजन सिमरन नहीं करते । कोई बाबा आपके कर्म नहीं ले सकता । जो किया है, सो भोगना पड़ेगा । इसी लिए स्वामी जी महाराज ने लिखा था “ कर्म जो जो करेगा तू, वही फ़िर भोगना भरना” ।
अपनी ताक़त दुनियावी धन दौलत कमाने में लगाने की बजाय हिम्मत और बहादुरी से अपने कर्मों का सामना करने में लगाओ और वह भी बिना रोये और बिना कोई शिकायत के । हम कह देते हैं कि हमारे कर्म ऐसे क्यों लिखे और अगर परमात्मा के लिए सब इंसान एक जैसे हैं तो परमात्मा ने किसी को अमीर और किसी को गरीब क्यों बनाया ??? तो जब हमने फ़सल मिर्ची की लगाई है तो हम आम की उम्मीद क्यों और कैसे कर सकते हैं । “जैसी करनी वैसी भरनी” ।
और हमारे पास जो कुछ भी है न, वह भी हमारा कमाया हुआ नहीं है, बल्कि उस परमात्मा की दया मेहर है, उसकी बक्शिश है । तो बिना रोए, बिना शिकायत के, हम भजन सिमरन करें । बाप बेहतर जानता है कि बच्चों के लिए क्या सही है और क्या ग़लत । जो किस्मत में है, वही मिलेगा । ज्यादा कमा भी लेंगे तो बीमारी में या किसी और काम में चला जाएगा । रहेगा उतना ही पास में, जितना मालिक देना चाहता है या जितना उसने हमारी किस्मत में लिखा है । नाम लेने के बाद कुछ समय भक्ति करते हैं और उसके बाद कहते हैं कि जी कुछ बना नहीं !!! जन्म-जन्म की इस मन को मैल चढ़ी हुई है और हम समझते हैं कि कुछ दिन भक्ति करने से उतर जाएगी ?
श्री हुज़ूर स्वामी जी महाराज ने सत्संगी को अपनी बानी में संत सिपाही इसी लिए लिखा है क्योंकि दुनिया में रहते हुए, ज़िन्दगी की लड़ाई एक सिपाही की तरह लड़ते हुए हम संतों की तरह भजन सिमरन करें और अपने कर्म समाप्त करने की कोशिश करें और यह तभी होगा जब हम उनके हुकुम और रज़ा में रहते हुए हर रोज़ भजन सिमरन करेंगे और हर रोज़ अपने इस शरीर रुपी बर्तन को साफ़ करेंगे और इसको और ज़्यादा गन्दा और मैला नहीं होने देंगे । साफ़ करने की हमने सिर्फ़ कोशिश करनी है सच्चे मन से, क्योंकि साफ़ करने की ताक़त हमारे में है नहीं, साफ़ भी परमात्मा ही करेगा और भरेगा भी परमात्मा ही, हम तो सिर्फ़ इसको और ज़्यादा गन्दा न होने दें ।
हुज़ूर उदाहरण देकर समझाया करते थे कि बच्चा मेले में जाता है, अपने बाप के साथ, उसकी उंगली पकड़ कर । मेले में सब कुछ देखकर बहुत खुश होता है लेकिन ग़लती से जब उससे अपने पिता की उंगली छूट जाती है तो सब कुछ वहीं पर होता है, लेकिन उसको कुछ अच्छा नहीं लगता, वह दुखी होता है और रोना शुरू कर देता है । तो बाबाजी ने संगत से साफ़ साफ़ शब्दों में सवाल किया *“क्या हमने अपने बाप की उंगली पकड़ी हुई है” ?* हम इस दुनिया में मस्त बैठे हैं और उसको भूले बैठे हैं । इस इस संसार रुपी मेले में भी अपने बाप का हाथ यानी परमात्मा और सतगुरु का हाथ हमें पकड़कर रखना चाहिए, वर्ना हम कभी खुश नहीं रह सकते । वह जो कुछ भी हमें देता है, उसकी रज़ा है । “जे राज कराए ताँ तेरी उपमा, जे भीख मंगाए ताँ क्या घट जाई” ???
वह कहीं हमसे दूर नहीं है, वह हर वक्त हमारे साथ है । लेकिन अपना ध्यान उस मालिक के साथ जोड़ कर रखना है । उसको सदा अंग-संग महसूस करना है, वह कहीं बाहर से नहीं मिलेगा । वह जब भी मिलेगा, अंदर से ही मिलेगा । साईं बुल्लेशाह ने भी समझाया था जब उन्होंने लिखा था कि... “वेद पुराण पढ़ पढ़ थक्के, सजदे करदियाँ घिस गए मथे, न रब्ब तीरथ न रब्ब मक्के, जिन पाया तिस दिल विच यार” । जिसने भी पाया है, अपने अन्दर से ही पाया है और जो भी कभी उसको मिलेगा, अंदर से ही मिलेगा । हम लोग तो दौलत इकट्ठे करते जाते हैं । दुनिया की दौलत वहां पर काम नहीं आएगी । वहां तो एक ही चीज काम आएगी कि हमने नाम और शब्द की कमाई कितनी की है । इसीलिए नवम पातशाह ने लिखा था कि ‘नाम रहेओ साधू रहेओ, रहेओ गुरु गोबिंद ।”
और अंत में आपने फरमाया कि सारे संत मत का निचोड़ कबीर साहिब ने एक ही कड़ी में बड़ी ख़ूबसूरती से ब्यान किया... “कबीर आधी साख यह कोटि ग्रन्थ कर जान | नाम सत्त जग झूठ है, सुरत शब्द पहचान ” । अगर मालिक की ख़ुशी लेना चाहते हो तो भजन सिमरन करो । यही एक तरीका है अपना गन्दा बर्तन साफ़ करने का और उसकी ख़ुशी हासिल करने का । इस को बाबाजी ने एक बार फ़िर दोहराया और फ़रमाया कि सभी ग्रन्थ पोथियों में, सभी संतों ने हमें यही उपदेश दिया है कि भजन सिमरन करो, मुक्ति इससे ही मिलेगी ।
*राधास्वामी जी 🙏🌹


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