Bhagwan Bhakti Nhi Tyag Hai | भगवान भक्ति नहीं त्याग है।

एक गांव के अंत पर एक साधु रहता था।अकेला एक झोपड़े में,जिसमें कि द्वार भी नहीं थे और कुछ भी नहीं था,जिसके लिए कि द्वारों की आवश्यकता हो!
एक दिन कुछ सैनिक उधर आए। वे उस झोपड़े में जल मांगने गए। उनमें से किसी ने साधु से पूछा ‘आप कैसे साधु हैं?
आपके पास भगवान की कोई मूर्ति भी नहीं दिखाई पड़ती है।
‘वह साधु बोला’ यह झोपड़ा देखते हैं कि बहुत छोटा है।
इसमें दो के रहने के योग्य स्थान कहां है?'
उसकी यह बात सुन कर वे सैनिक हंसे और दूसरे
दिन भगवान की एक मूर्ति लेकर उसे भेंट करने लगे।

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पर उस साधु ने कहा ‘मुझे भगवान की मूर्ति की कोई आवश्यकता नहीं, क्योंकि बहुत दिन हुए तब से वे
ही यहां रहते हैं,’मैं' तो मिट गया हूं।
देखते नहीं हैं कि यहां दो के रहने योग्य स्थान नहीं है?'
और उन सैनिकों ने देखा कि वह अपने हृदय की ओर इशारा कर रहा था। वही उसका झोपड़ा था।
परमात्मा अमूर्त है। वह निराकार है। चेतना का आकार नहीं हो सकता।
वह असीम है। सर्वव्यापि की कोई सीमा नहीं हो सकती है।वह अनादि है, अनंत है, क्योंकि’जो है'उसका आदि—अंत तक नहीं हो सकता है।
और हम कैसे बच्चे हैं कि उसकी भी मूर्तियां बना लेते हैं?
और फिर इन स्व—निर्मित मूर्तियों की पूजा करते हैं।
मनुष्य ने अपनी ही शकल में परमात्मा को गढ़ लिया है
और फिर इस भांति अपनी ही पूजा स्वयं ही किया करता है।

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आत्मवचना, अहंकार और अज्ञान की यह अति है।भगवान की पूजा नहीं करनी होती है,भगवान को जीना होता है।उसकी मंदिर में नहीं,जीवन में प्रतिष्ठा करनी होती है।वह हृदय में विराजमान होऔर श्वास—श्वास मे परिव्याप्त हो जाए,ऐसी साधना करनी होती है।और इसके लिए जरूरी है कि‘मैं' विलीन हो!
उसके रहते प्रभु—प्रवेश नहीं हो सकता है।कबीर जी ने कहा है कि ,,प्रेम की वह गली
‘अति सांकरी' है और इसमें दो ना सामाए,
जब मैं था तब हरि नहीं ओर जब हरि है तो मैं नाहीं।।
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