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Showing posts from April, 2018

Saakhi- Sansarik Sukh hi Dukh ka Karan Hai | 5 अजगर और आदमी।

🙏बाबा जग फाथा महाजाल,गुर परसादी उबरे सच्चा नाम सँभाल एक इंसान घने जंगल में भागा जा रहा था।
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शाम हो गई थी।
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अंधेरे में कुआं दिखाई नहीं दिया और वह उसमें गिरने लगा।
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गिरते-गिरते कुएं पर झुके पेड़ की एक डाल उसके हाथ में आ गई। जब उसने नीचे झांका, तो देखा कि कुएं में पांच अजगर मुंह खोले उसे देख रहे हैं |
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जिस डाल को वह पकड़े हुए था, उसे दो चूहे कुतर रहे थे।
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इतने में एक हाथी आया और पेड़ को जोर-जोर से हिलाने लगा।
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वह घबरा गया और सोचने लगा कि हे भगवान अब क्या होगा ?
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उसी पेड़ पर मधुमक्खियों का छत्ता लगा था।
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हाथी के पेड़ को हिलाने से मधुमक्खियां उडऩे लगीं और शहद की बूंदें टपकने लगीं।
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एक बूंद उसके होठों पर आ गिरी। उसने प्यास से सूख रही जीभ को होठों पर फेरा, तो शहद की उस बूंद में गजब की मिठास थी।
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कुछ पल बाद फिर शहद की एक और बूंद उसके मुंह में टपकी।
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अब वह इतना मगन हो गया कि अपनी मुश्किलों को भूल गया।
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तभी उस जंगल से  भगवान अपने वाहन से गुजरे।
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भगवान  ने उसके पास जाकर कहा - मैं तुम्हें बचाना चाहता हूं। मेरा हाथ पकड़ लो।
उस इंसान ने कहा कि एक बूंद शहद और चाट लूं, फिर चलता…

Bhagwan Bhakti Nhi Tyag Hai | भगवान भक्ति नहीं त्याग है।

एक गांव के अंत पर एक साधु रहता था।अकेला एक झोपड़े में,जिसमें कि द्वार भी नहीं थे और कुछ भी नहीं था,जिसके लिए कि द्वारों की आवश्यकता हो!
एक दिन कुछ सैनिक उधर आए। वे उस झोपड़े में जल मांगने गए। उनमें से किसी ने साधु से पूछा ‘आप कैसे साधु हैं?
आपके पास भगवान की कोई मूर्ति भी नहीं दिखाई पड़ती है।
‘वह साधु बोला’ यह झोपड़ा देखते हैं कि बहुत छोटा है।
इसमें दो के रहने के योग्य स्थान कहां है?'
उसकी यह बात सुन कर वे सैनिक हंसे और दूसरे
दिन भगवान की एक मूर्ति लेकर उसे भेंट करने लगे।
पर उस साधु ने कहा ‘मुझे भगवान की मूर्ति की कोई आवश्यकता नहीं, क्योंकि बहुत दिन हुए तब से वे
ही यहां रहते हैं,’मैं' तो मिट गया हूं।
देखते नहीं हैं कि यहां दो के रहने योग्य स्थान नहीं है?'
और उन सैनिकों ने देखा कि वह अपने हृदय की ओर इशारा कर रहा था। वही उसका झोपड़ा था।
परमात्मा अमूर्त है। वह निराकार है। चेतना का आकार नहीं हो सकता।
वह असीम है। सर्वव्यापि की कोई सीमा नहीं हो सकती है।वह अनादि है, अनंत है, क्योंकि’जो है'उसका आदि—अंत तक नहीं हो सकता है।
और हम कैसे बच्चे हैं कि उसकी भी मूर्तियां बना लेते हैं?
और फिर इन स्व—निर्…

कहानी “नालायक बेटा” | Nalayak Beta | Radha Soami

नालायक बेटा देर रात अचानक ही पिता जी की तबियत बिगड़ गयी।आहट पाते ही उनका नालायक बेटा उनके सामने था।
माँ ड्राईवर बुलाने की बात कह रही थी, पर उसने सोचा अब इतनी रात को इतना जल्दी ड्राईवर कहाँ आ पायेगा ????? यह कहते हुये उसने सहज जिद और अपने मजबूत कंधो के सहारे बाऊजी को कार में बिठाया और तेज़ी से हॉस्पिटल की ओर भागा। बाउजी दर्द से कराहने के साथ ही उसे डांट भी रहे थे “धीरे चला नालायक, एक काम जो इससे ठीक से हो जाए।” नालायक बोला
“आप ज्यादा बातें ना करें बाउजी, बस तेज़ साँसें लेते रहिये, हम हॉस्पिटल पहुँचने वाले हैं।” अस्पताल पहुँचकर उन्हे डाक्टरों की निगरानी में सौंप,वो बाहर चहलकदमी करने लगा , बचपन से आज तक अपने लिये वो नालायक ही सुनते आया था।
उसने भी कहीं न कहीं अपने मन में यह स्वीकार कर लिया था की उसका नाम ही शायद नालायक ही हैं । तभी तो स्कूल के समय से ही घर के लगभग सब लोग कहते थे की नालायक फिर से फेल हो गया। नालायक को अपने यहाँ कोई चपरासी भी ना रखे। कोई बेवकूफ ही इस नालायक को अपनी बेटी देगा। शादी होने के बाद भी वक्त बेवक्त सब कहते रहते हैं की इस
बेचारी के भाग्य फूटें थे जो इस नालायक के पल्ले पड़ गयी। ह…