देने वाला कौन ?? Radha Soami Sakhi

देने वाला कौन ?


आज हमने भंडारे में भोजन करवाया। आज हमने ये बांटा, आज हमने वो दान किया...
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 हम अक्सर ऐसा कहते और मानते हैं। इसी से सम्बंधित एक अविस्मरणीय कथा सुनिए...
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एक लकड़हारा रात-दिन लकड़ियां काटता, मगर कठोर परिश्रम के बावजूद उसे आधा पेट भोजन ही मिल पाता था।
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एक दिन उसकी मुलाकात एक साधु से हुई। लकड़हारे ने साधु से कहा कि जब भी आपकी प्रभु से मुलाकात हो जाए, मेरी एक फरियाद उनके सामने रखना और मेरे कष्ट का कारण पूछना।
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कुछ दिनों बाद उसे वह साधु फिर मिला। 
लकड़हारे ने उसे अपनी फरियाद की याद दिलाई तो साधु ने कहा कि- "प्रभु ने बताया हैं कि लकड़हारे की आयु 60 वर्ष हैं और उसके भाग्य में पूरे जीवन के लिए सिर्फ पाँच बोरी अनाज हैं। इसलिए प्रभु उसे थोड़ा अनाज ही देते हैं ताकि वह 60 वर्ष तक जीवित रह सके।"
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समय बीता। साधु उस लकड़हारे को फिर मिला तो लकड़हारे ने कहा---
"ऋषिवर...!! अब जब भी आपकी प्रभु से बात हो तो मेरी यह फरियाद उन तक पहुँचा देना कि वह मेरे जीवन का सारा अनाज एक साथ दे दें, ताकि कम से कम एक दिन तो मैं भरपेट भोजन कर सकूं।"
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अगले दिन साधु ने कुछ ऐसा किया कि लकड़हारे के घर ढ़ेर सारा अनाज पहुँच गया। 
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लकड़हारे ने समझा कि प्रभु ने उसकी फरियाद कबूल कर उसे उसका सारा हिस्सा भेज दिया हैं। 
उसने बिना कल की चिंता किए, सारे अनाज का भोजन बनाकर फकीरों और भूखों को खिला दिया और खुद भी भरपेट खाया।
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लेकिन अगली सुबह उठने पर उसने देखा कि उतना ही अनाज उसके घर फिर पहुंच गया हैं। उसने फिर गरीबों को खिला दिया। फिर उसका भंडार भर गया। 
यह सिलसिला रोज-रोज चल पड़ा और लकड़हारा लकड़ियां काटने की जगह गरीबों को खाना खिलाने में व्यस्त रहने लगा।
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कुछ दिन बाद वह साधु फिर लकड़हारे को मिला तो लकड़हारे ने कहा---"ऋषिवर ! आप तो कहते थे कि मेरे जीवन में सिर्फ पाँच बोरी अनाज हैं, लेकिन अब तो हर दिन मेरे घर पाँच बोरी अनाज आ जाता हैं।"
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साधु ने समझाया, "तुमने अपने जीवन की परवाह ना करते हुए अपने हिस्से का अनाज गरीब व भूखों को खिला दिया। 
इसीलिए प्रभु अब उन गरीबों के हिस्से का अनाज तुम्हें दे रहे हैं।"
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कथासार- *किसी को भी कुछ भी देने की शक्ति हम में है ही नहीं, हम देते वक्त ये सोचते हैं, की जिसको कुछ दिया तो  ये मैंने दिया*!
दान, वस्तु, ज्ञान, यहाँ तक की अपने बच्चों को भी कुछ देते दिलाते हैं, तो कहते हैं मैंने दिलाया । 
वास्तविकता ये है कि वो उनका अपना है आप को सिर्फ परमात्मा ने निमित्त मात्र बनाया हैं। ताकी उन तक उनकी जरूरते पहुचाने के लिये। तो निमित्त होने का घमंड कैसा ??
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दान किए से जाए दुःख, दूर होएं सब पाप।।
नाथ आकर द्वार पे, दूर करें संताप।।☺☺
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Radha soami g guru pyari sad sangat g

साखी भगत कबीर जी। Radha Soami Sakhi


भगत जी,आज घर मे खाने को कुछ नही है,आटा, नमक,दाल, चावल,गुड़ शक्कर सब खत्म हो गया है,शाम को बाजार से आते हुए घर के लिए राशन का सामान लेते आईयेगा,,


कन्धे पर कपड़े का थान लादे,हाट बाजार जाने की तैयारी करते हुए,भगत कबीर जी को माता लोई जी ने सम्बोधन करते हुए कहा

देखता हूँ,लोई जी,अगर कोई अच्छा मूल्य मिला,तो निश्चय ही घर मे आज धन धान्य आ जायेगा
कबीर जी ने उत्तर दिया


सांई जी,अगर अच्छी कीमत ना भी मिले तब भी इस बुने थान को बेच कर कुछ राशन तो ले आना,घर के बड़े बूढ़े तो भूख बर्दाश्त कर लेंगे पर कमाल ओर कमाली अभी छोटे हैं, उनके लिए तो कुछ ले ही आना

जैसी मेरे राम की इच्छा,


ऐसा कह के कबीर हाट बाजार को चले गए

बाजार में

उन्हें किसी ने पुकारा

वाह सांई,कपड़ा तो बड़ा अच्छा बुना है,ठोक भी अच्छी लगाई है,तेरा परिवार बसता रहे,ये फकीर ठंड में कांप कांप कर मर जाएगा,दया के घर मे आ,ओर रब के नाम पर 2 चादरे का कपड़ा इस फकीर की झोली में डाल दे

2 चादरे में कितना कपड़ा लगेगा फकीर जी?

फकीर ने जितना कपड़ा मांगा, इतेफाक से कबीर जी के थान में कुल कपड़ा उतना ही था

कबीर जी ने थान फकीर को दान कर दिया

दान करने के बाद,जब घर लौटने लगे तो उनके सामने अपनी माँ नीमा, वृद्ध पिता नीरू,छोटे बच्चे कमाल,ओर कमाली के भूखे चेहरे नजर आने लगे

फिर लोई जी की कही बात

घर मे खाने की सब सामग्री खत्म है,दाम कम भी मिले तो भी कमाल ओर कमाली के लिए कुछ ले आना

अब दाम तो क्या?थान भी दान जा चुका था

कबीर गंगा तट पर आ गए

जैसी मेरे राम की इच्छा,जब सारी सृष्टि की सार खुद करता है,अब मेरे परिवार की सार भी वो ही करेगा

कबीर अपने राम की बन्दगी में खो गए

अब भगवान कहां रुकने वाले थे,कबीर ने सारे परिवार की जिम्मेवारी अब उनके सुपुर्द कर दी थी

अब भगवान जी ने कबीर जी की झोपड़ी का दरवाजा खटखटाया

कौन है

माता लोई जी ने पूछा

कबीर का घर यहीं है ना?
भगवान जी ने पूछा

हांजी,लेकिन आप कौन?

सेवक की क्या पहचान होती है भगतानी?

जैसे कबीर राम का सेवक,वैसे मैं कबीर का सेवक

ये राशन का सामान रखवा लो

माता लोई जी ने दरवाजा पूरा खोल दिया

फिर इतना राशन घर मे उतरना शुरू हुआ कि घर के जीवों की घर में रहने की जगह कम पड़ गई

इतना सामान, कबीर जी ने भेजा? मुझे नही लगता

हाँ भगतानी,आज कबीर का थान  सच्ची सरकार ने खरीदा है

जो कबीर का सामर्थ्य था उसने भुगता दिया

जो मेरी सरकार का सामर्थ्य है वो चुकता कर रही है

जगह और बना,सब कुछ आने वाला है भगत जी के घर में

शाम ढलने लगी थी,रात का अंधेरा अपने पांव पसारने लगा था

समान रखवाते रखवाते लोई जी थक चुकी थी,नीरू ओर नीमा घर मे अमीरी आते देख खुश थे,कमाल ओर कमाली कभी बोरे से शक्कर निकाल कर खाते, कभी गुड़,कभी मेवे देख कर मन ललचाते, झोली भर भर कर मेवे ले कर बैठे उनके बालमन,अभी तक तृप्त नही हुए थे

कबीर अभी तक घर नही आये थे,सामान आना लगातार जारी था

आखिर लोई जी ने हाथ जोड़ कर कहा

सेवक जी,अब बाकी का सामान कबीर जी के आने के बाद ही आप ले आना,हमे उन्हें ढूंढने जाना है,वो अभी तक घर नही आए

वो तो गंगा किनारे सिमरन कर रहे हैं भगवन बोले

नीरू,नीमा,लोई जी,कमाल ओर कमाली को ले गंगा किनारे आ गए
कबीर जी को समाधि से उठाया

सब परिवार को सामने देख,कबीर जी सोचने लगे जरूर ये भूख से बेहाल हो मुझे ढूंढ रहे हैं

इससे पहले कबीर जी कुछ बोलते

उनकी माँ नीमा जी बोल पड़ी

कुछ पैसे बचा लेने थे,अगर थान अच्छे भाव बिक गया था,सारा सामान तूने आज ही खरीद कर घर भेजना था क्या?

कबीर जी कुछ पल के लिए विस्मित हुए

फिर लोई जी,माता पिता और बच्चों के खिलते चेहरे देख कर उन्हें एहसास हो गया

जरूर मेरे राम ने कोई खेल कर दी है

अच्छी सरकार को आपने थान बेचा, वो तो समान घर मे फैंकने से रुकता ही नही था,पता नही कितने वर्षों तक का राशन दे गया,उससे मिन्नत कर के रुकवाया,बस कर,बाकी कबीर जी के आने के बाद उनसे पूछ कर कहीं रख्वाएँगे लोई जी ने शिकायत की
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कबीर हँसने लगे और बोले

लोई जी,वो सरकार है ही ऐसी,जब देंना शुरू करती है तो सब लेने वाले थक जाते है,उसकी बख्शीश कभी भी खत्म नही होती,उस सच्ची सरकार की तरह सदा कायम रहती है

New Dera beas question answer | Radha soami sakhi

1.लड़का – बाबा जी आज से 2 -3 साल पहले में काफी देर तक भजन सिमरन कर लेता था और आपसे प्यार भी बहुत करता था, लेकिन अब मन भजन सिमरन में नही लगता और आपसे प्यार भी कम हो गया है । इसका क्या कारण है?
बाबा जी – अच्छा अब किससे प्यार हो गया है, जो मुझसे कम प्यार हो गया है।(sangat laughs)
बेटा प्यार कभी भी कम या ज्यादा नही होता है। ये बंट जाता है। जितना हम अपना ख्याल बाहर फैलाएंगे हमारा प्यार मालिक से कम होगा।
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2.लड़का – बाबा जी मुझे अपना PA(Personal assistant) बना लो।
बाबाजी – भई क्यों, मै तो PA रखता नही।
लड़का – तो बाबा जी security guard रख लो।
बाबाजी – पर बेटा जो पहले है, क्या वो सेवा ठीक से नही कर रहे।
लड़का – तो बाबा जी Secretary बनालो।
बाबाजी – भाई जाकर Secretary साहब से बात करलो की आप हटो मुझे Secretary बनना है। (संगत ज़ोर से हंसी)
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3.लड़की – बाबाजी मुझे किसी कनाडा के लड़के से शादी करनी है, और वो भी 2 या 3 साल के अंदर। आप मेरी शादी कनाडा में करवा दो।
बाबाजी – क्यों बेटा पंजाब लड़को में क्या कमी है।
लड़की – नही बाबाजी मुझे तो कनाडा में ही शादी करनी है।
बाबाजी – फिर यहाँ मैरिज ब्यूरो खोल लेते है, (बाबा जी पंजाबी में ) ओथे ऐनी ठंड हुन्दी है ऐवी बोंदल जावेंगी (वहां इतनी ठण्ड होती है कि घबरा जाओगी (संगत में ठहाका ).
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4.लड़का – बाबाजी मेनू अपना ड्राइवर बना लो।
बाबाजी – (with smile) मै अज तों सारेयां दी छुटी कर देंदा ते तुहानु सारेयां नू रख लैन्दा हाँ … कोई secretary बन जाऊ कोई गॉर्ड ते कोई ड्राइवर। (मैं आज से इन सारे सेवादारों की छुट्टी कर देता हूँ और तुम सब को रख लेता हूँ, कोई ड्राइवर बन जायेगा, कोई सेक्रेटरी और कोई गार्ड )
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5. लड़की – Babaji you are so beautiful (बाबा जी आप बहुत ब्यूटीफुल हैं )
Babaji – बेटा women are beautiful.. Men are supposed to be Handsome (बेटा, औरतों को ब्यूटीफुल कहते हैं, आदमियों को तो हैंडसम कहा जाता है (संगत जोर से हंसी, कुछ लोगो ने तालियां भी बजायी).
लड़की – बाबा जी सॉरी, मैं आगे से सही बोलूंगी और आपकी अच्छी बेटी बन के दिखाउंगी
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6. लड़का – बाबाजी की भूत प्रेत होते हैं।
बाबाजी – बेटा जिने विश्वास नाल तू कह रेहा है मेनू लग रेआ हुंदे है। (संगत हंसी ) [बेटा जितने भरोसे से आप कह रहे हो मुझे लगता है होते ही होंगे ]
लड़का – नही बाबाजी मै ता पूछ रेहा हाँ। [नहीं बाबा जी मैं तो पूछ रहा हूँ ]
बाबाजी – बेटा ऐह सब सांढियां कमजोरियों ने। सिमरन करो। [ बेटा ये सब हमारी कमज़ोरियाँ हैं, आप सिमरन पर ध्यान दो
लड़का – पर बाबाजी हुंदे ए के नहीं। [ मगर ये होते हैं या नहीं ]
बाबा जी – नहीं हुंदे। [नहीं होते ]
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7. लड़का – बाबाजी मेनू कुछ नी चाहिदा बस मेनू तुसी चाहिदे हो और कोई चीज नही चाहिदी बस तुहाडे ते सारे सतगुरु दे दर्शन चाहिदे ने.. [बाबा जी मुझे कुछ नहीं चाहिए, मुझे बस आप चाहिए हो, और कोई चीज़ नहीं चाहिए, बस आपके और बाकि महाराज जी, बड़े महाराज जी सबके दर्शन ही चाहिए ]
बाबा जी – बेटा सोच ता अच्छी ए पर ईस वास्ते मेहनत कारन दी लोड है .. प्यार दी जरुरत है। प्रेम दी जरुरत है। जे आपा अपना लक्ष अगे रख के चलोगे ता मालिक जरूरत बख्शीश करनगे। [ बेटा सोच तो आपकी बड़ी अच्छी है परन्तु इसके लिए मेहनत करने की ज़रूरत है, प्यार की ज़रूरत है, अगर आप अपना लक्ष्य बना के कोशिश करोगे तो मालिक ज़रूर आपकी बात सुनेंगे ]
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8. लड़की – बाबाजी मै अपने पिछ्ले सालां विच एक गलती किती है जिस कारण हुन मैं पछता वी रही हाँ, लेकिन बाबाजी मेरी इक सहेली ओही गलती कर रही है पर बाबाजी जदों मै उस नू समझाया ताँ ओह समझदी ही नहीं। जदकी उसनू वी पता है की ओ गलत कर रही है। [बाबा जी मैंने अपने पिछले कुछ सालों में एक गलती की है जिस वजह से मैं अब पछता भी रही हूँ, लेकिन मेरी एक सहेली भी वही गलती कर रही है और जब मैंने उसको समझाया तो वो समझती नहीं जबकि उसको भी पता है कि वो गलत कर रही है]
Babaji – बेटा देखो इंसान नु जिंदगी मिली है कुछ सिखण दे लई। आपां जे कुछ सिखांगे ही नहीं ताँ की फायदा इस जिंदगी दा। तुसीं अपनी Friend नु सिर्फ लफ्जा दे जरिये समझा सकदे हो। ओह्दी जगह ते उस्दी लाइफ जी नहीं सकदे। अपनी तरफ धयान देओ, अपनी जिंदगी सुधारो। ओहदे कर्म तुसी नी चुक सकदे। [ बेटा देखो इंसान को कुछ सीखने के लिए ज़िन्दगी मिली है, हम अगर कुछ सीखेंगे नहीं तो क्या फायदा इस ज़िन्दगी का, आप अपनी सहेली को सिर्फ शब्दों से ही समझा सकते हो, उसकी जगह उसकी ज़िन्दगी तो नहीं जी सकते, आपने अपना फ़र्ज़ निभा दिया, अब आप अपनी ज़िन्दगी सुधारो , आप उसके कर्मों का बोझ नहीं उठा सकते ] प्यार भरी राधा सवामी जी…

वचनों को समझने की देर। Radha Soami Sakhi

। बहुत ही सुन्दर कहानी ।

एक राजा था जिसे राज भोगते काफी समय हो गया था बाल भी सफ़ेद होने लगे थे ।
एक दिन  उसने अपने दरबार मे उत्सव रखा और अपने गुरु तथा मित्र देश के राजाओ को भी सादर आमंत्रित किया ।
उत्सव को रोचक बनाने के लिए राज्य की सुप्रसिद्ध नर्तकी को भी बुला भेजा ।
राजा ने कुछ स्वर्ण मुद्राए अपने गुरु को दी ताकि नर्तकी के अच्छे गीत नृत्य पर वे उसे पुरस्कृत कर सके ।

सारी रात नृत्य चलता रहा । सुबह होने वाली थीं, नर्तकी ने देखा कि मेरा तबले वाला ऊँघ रहा है, उसको जगाने के लियें नर्तकी ने एक दोहा पढ़ा,

*"बहु बीती, थोड़ी रही,*
                 *पल पल गयी बिहाई ।*
*एक पलक के कारने,*
                 *ना कलंक लग जाई।"*

अब इस दोहे का अलग अलग व्यक्तियों ने अलग अलग अपने अपने अनुरूप अर्थ निकाला ।

तबले वाला सतर्क हो बजाने लगा।
जब ये बात गुरु ने सुनी, गुरु ने सारी मोहरे उस मुज़रा करने वाली को दे दी ।

वही दोहा उसने फिर पढ़ा तो राजा के लड़की ने अपना नवलखा हार दे दिया ।

उसने फिर वही दोहा दोहराया तो राजा के लड़के ने अपना मुकट उतारकर दे दिया ।

वही दोहा दोहराने लगी राजा ने कहा बस कर एक दोहे से तुमने वेश्या होकर सबको लूट लिया है ।

जब ये बात राजा के गुरु ने सुनी गुरु के नेत्रो मे जल आ गया और कहने लगा, "राजा इसको तू वेश्या न कह, ये अब मेरी गुरू है।
इसने मेरी आँखे खोल दी है कि मै सारी उम्र जंगलो मे भक्ति करता रहा और आखरी समय मे मुज़रा देख कर अपनी साधना नष्ट करने आ गया हूँ, भाई मै तो चला !

राजा की लड़की ने कहा, "आप मेरी शादी नहीं कर रहे थे, आज मैंने आपके महावत के साथ भागकर अपना जीवन बर्बाद कर लेना था । इसनें मुझे सुमति दी है कि कभी तो तेरी शादी होगी । क्यों अपने पिता को कलंकित करती है ? "

राजा के लड़के ने कहा, "आप मुझे राज नहीं दे रहे थे । मैंने आपके सिपाहियो से मिलकर आपका क़त्ल करवा देना था । इसने समझाया है कि आखिर राज तो तुम्हे ही मिलना है। क्यों अपने पिता के खून का कलंक अपने सर लेते हो ?

जब ये बातें राजा ने सुनी तो राजा को भी आत्मज्ञान हुआ क्यों न मै अभी राजकुमार का राजतिलक कर दूँ, गुरु भी मौजूद है ।
उसी समय राजतिलक कर दिया और लड़की से कहा बेटी, "मैं जल्दी ही योग्य वर देख कर तुम्हारा भी विवाह कर दूँगा।"

यह सब देख कर मुज़रा करने नर्तकी ने कहा कि,
मेरे एक दोहे से इतने लोग सुधर गए, मै तो ना सुधरी। आज से मै अपना धंधा बंद करती हूँ  ।
*हे प्रभु!*
          आज से मै भी,
          तेरा नाम सुमिरन करुँगी ।

समझ आने की बात है, दुनिया बदलते देर नहीं लगती। एक दोहे की दो लाईनों से भी ह्रदय परिवर्तन हो सकता है, केवल थोड़ा धैर्य रख कर चिंतन करने की आवश्यकता  है।
इसे भी पढ़ें - सिमरन का महत्व

*"प्रशंसा" से "पिंघलना" मत,* *"आलोचना" से "उबलना" मत,*
*निस्वार्थ भाव से कर्म करते रहो,*

क्योंकि ....

*इस "धरा" का, इस "धरा" पर,*
               *सब "धरा ही रह जाएगा ।*
*मुट्ठी बाँध आया बन्दे,*
               *हाथ पसारे जायेगा।।*
राधा स्वामी जी।
Radha soami sakhi sabke sath share kren ji

कदमों के निशान। Radha Soami Sakhi

Radhasoami ji
कदमों के निशान

एक सत्संगी डेरे में खूब सेवा किया करता था। महाराज जी ने उसकी सेवा भक्ति से खुश होकर उससे मिलने को कहा। उससे बाबाजी ने कहा कि तुम अपनी सेवा का क्या सिला चाहते हो तो उसने कहा की बाबाजी आप हर दम मेरे साथ रहना पर बाबाजी ने कहा की मुझे तो यहाँ और भी बहुत काम होते है मैं हरदम कैसे तेरे साथ रह सकूँगा पर वो नहीं माना और हट पे अड़ गया।

फिर बाबाजी ने कहा ठीक है मैं रहूँगा हर दम तेरे साथ, तभी सारे सेवादार हैरान रह गए की अभी तो बाबाजी ने कहा था की उन्हें बहुत काम होते है और अभी वो इस भले बन्दे के साथ हर दम कैसे ??

बाबाजी ने कहा की बन्दे मैं तेरे साथ तो हरदम रहूँगा तो उसने कहा की मैं कैसे यकीन करलू की आप हरदम मेरे साथ रहेंगे तो बाबाजी ने कहा की तू जहाँ एक कदम चलेगा वहाँ तेरे कदमो के निशाँ के साथ मेरे कदमो के निशाँ भी तुझे दिखेंगे।

वो खुश होकर चल पड़ा। कई साल बीत गए और वो जहाँ जहाँ चले वहाँ वहाँ उसे अपने कदमो के साथ दो कदम और दिखाई दे।
 मगर एक दिन वो चल रहा था तो उसने देखा की रोज़ तो दो कदम और दिखते थे पर आज तो केवल दो ही कदम ऐसा क्यों?? उसका वक्त भी खराब चल रहा था, व्यापार में नुकसान, घर बार बिकने की कगार पर था।

 वो सीधा डेरे गया और बाबाजी से मिलना चाहा पर कुछ सेवादारो ने उसे जाने से मन किया। पर उस बन्दे ने उनका कहा न माना और बाबाजी से तुरंत मिलने की गुजारिश की।

बाबाजी तो जानी जान है, उन्हों ने उसे अंदर आने दिया और कहा बोल बन्दे मैंने अपना काम ठीक से किया ना मैं हरदम तेरे साथ था ना?

तभी उस बन्दे ने कहा की नहीं महाराज जी मुझसे ऐसी क्या भूल हो गयी थी की आप ने मेरा साथ छोड़ दिया।
मैं जब भी दो कदम चलता साथ में दो कदम और दिखते पर अब ऐसा नहीं है मुझे केवल दो ही कदम दीखते है।

ऐसा क्यों महाराज जी ये वक़्त तो ऐसा था जिसमे मुझे आपकी बहुत ज़रूरत थी मेरा सब कुछ लुट गया था। ना घर था ना कारोबार, आपने मेरा साथ इतने मुश्किल समय में क्यों छोड़ दिया।

इसके जवाब में महाराज जी ने कहा कि बन्दे वो जो तू सोच रहा है वैसा बिलकुल नहीं है, मैं हरदम तेरे साथ ही था। उसने कहा की फिर वो दो कदम क्यों नही चलते थे?

इसके जवाब में बाबाजी ने कहा की जिन दो कदमो की बात तू कर रहा है वो कदम मेरे थे, तुझमे तो खुद अपने पैरो पे चलने तक की ताकत नहीं बची थी। तुझे तो मैंने अपने कंधो पर उठा रखा था।

ये सुनकर उसे एहसास हुआ की उसकी सोच, उसका भरोसा कितना जल्दी उठ गया पर महाराज जी ने उसका साथ नहीं छोड़ा। फिर उसने अपने इस व्यवहार के लिए बाबाजी से माफ़ी मांगी और कहा कि आप इसी तरह हरदम मेरे साथ रहिएगा।
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इसीलिए कहते है की सब कुछ उस मालिक पे छोड़ दो फेर देखो वो मालिक सब अच्छा ही करेंगे। हमारा मन ज़रूर डोल सकता है पर वो तो पूरण परमात्मा सच्चा सतगुरु है वो कभी हमारा साथ नहीं छोड़ेंगे।

राधा स्वामी जी

साखी सरदार बहादुर जगत सिंह जी।Radha Soami Sakhi


लगभग एक या डेढ़ साल पहले बाबा जी ने व्यास के सत्संग में सरदार बहादुर महाराज जगत सिंह जी की एक साखी सुनाई,

बाबा जी ने कहा की "एक दफा सरदार बहादुर जी ने किसी
सेवक को बुलाकर कहा की यह तस्वीर सामने उस दीवार पर लगा दे,
तो अब क्यूंकि जहाँ तस्वीर लगानी थी वह जगह थोडी ऊंची थी इसलिए वह सेवक कोई मेज़ या स्टूल देखने लगा तो हुजुर ने कहा के मेरे पलंग पर चढ़ के तस्वीर लगा दे, उस सेवक ने कहा के हुजुर इस पलंग पर तो आप सोते हो मैं इस पर पैर कैसे रख सकता हूँ,
फिर हुजुर ने कहा की चल तो फिर उस कुर्सी पे ही चढ़ के लगा दे तो इस बार फिर उस सेवक ने वही जवाब दोहराया की हुजुर उस कुर्सी पे तो आप बैठते हो भला मैं उस पर पाँव कैसे रख सकता हूँ,
फिर वह सेवक बाहर से कोई स्टूल लाया और उस पर चढ़ कर तस्वीर को लगा दिया और बोला  की  "हुजुर और कोई हुक्म" तो हुजुर ने कहा की बेटा तूने मेरे पलंग और कुर्सी पर तो  पाँव नही रखा लेकिन मेरी जुबान पर पाँव जरूर रख दिया"
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दरअसल बाबा जी हमें इस साखी के जरिये एक ही बात समझाना चाहते थे की संतों का एक ही हुक्म होता है की भजन सुमिरन करो लेकिन हम उनके हुक्म को तो मानते नही बल्कि अपने मन के अनुसार चल के संतो के हुक्म की और से बेपरवाह हो जाते है



हमे चाहिए की बाबा जी के हुक्म अनुसार रोज़ रोज़ भजन पर बैठ कर बाबा जी की खुशियाँ हासिल करें.

बाबा जी लगभग हर सत्संग में हमें प्रार्थना करनी सीखाते है तो आइये हम सब बाबा जी के वचनों को दोहराते हुए कहें की ""दात्या भुल्लंहार हाँ बख्श ले बख्श ले""
🙏🏼🙏🏼🙏🏼राधास्वामी जी

What is the Size Of God ?? RADHA SOAMI SAKHI

What's​ the size of God?   Worth reading

A boy asked the father: _What’s the size of God?_
Then the father looked up to the sky and seeing an airplane asked the son: What’s the size of that airplane?
The boy answered: It’s very small. I can barely see it.
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 So the father took him to the airport and as they approached an airplane he asked: And now, what is the size of this one?
The boy answered: Wow daddy, this is huge! Then the fathsakhier told him: Like this is God, His size depends on how distant you are from Him.
The closer you are to Him, the greater He will be in your life!

राबिया बसरी की साखी। Rabia Basri ki sakhi Radha Soami G

राबिया बसरी एक महशूर फ़क़ीर हुई है! जवानी में वह बहुत खूबसूरत थी | एक बार चोर उसे उठाकर ले गए और एक वेश्या के कोठे पर ले जाकर उसे बेच दिया | अब उसे वही कार्य करना था जो वहाँ की बाक़ी औरते करती थी |

इस नए घर में पहली रात को उसके पास एक आदमी लाया गया | उसने फौरन बातचीत शुरू कर दी | ' आप जैसे भले आदमी को देखकर मेरा दिल बहुत खुश है " वह बोली | ' आप सामने पड़ी कुर्सी पर बैठ जाये , में में थोड़ी देर परमात्मा की याद में बैठ लूँ | अगर आप चाहे तो आप भी परमात्मा की याद में बैठ जाएँ | 'यह सुनकर उस नवजवान की हैरानी की कोई हद न रही |
 वह भी राबिया के साथ ज़मीन पर बैठ गया | फिर राबिया उठी और बोली ' मुझे विश्वास है की अगर में आपको याद दिला दूँ की एक दिन हम सबको मरना है तो आप बुरा नही मानोगे | आप यह भी भली भाँति समझ ले की जो गुनाह करने की आपके मन में चाहा है , वह आपको नर्क की आग में धकेल देगा | आप खुद ही फैसला कर ले की आप यह गुनाह करके नर्क की आग आग में कूदना चाहते है या इससे बचना चाहते है|'
यह सुनकर नवजवान हक्का बक्का रह गया| उसने संभलकर कहा, ऐ नेक और पाक औरत, तुमने मेरी आँखे खोल दी , जो अभी तक गुनाह के भयंकर नतीजे की और बंद थी | मै वादा करता हूँ की फिर कभी कोठे की तरफ कदम नही बढ़ाऊंगा |
हर रोज नए आदमी राबिया के पास भेजे जाते | पहले दिन आये नवजवान की तरह उन सबकी जिंदगी भी पलटती गयी | उस कोठे के मालिक को बहुत हैरानी हुई की इतनी खूबसूरत और नवजवान औरत है और एक बार आया ग्राहक दोबारा उसके पास जाने के लिए नही आता, जबकि लोग ऐसी सुन्दर लड़की इए दीवाने होकर उसके इर्दगिर्द ऐसे घूमते है जैसे परवाने शमा के इर्दगिर्द |
 यह राज जानने के लिए उसने एक रात अपनी बीवी को ऐसी जगह छुपाकर बिठा दिया, जहां से वह राबिया के कमरे के अंदर सब कुछ देख सकती थी | वह यह जानना चाहता था की जब कोई आदमी राबिया के पास भेजा जाता है तो वह उसके साथ कैसे पेश आती है?
उस रात उसने देखा की जैसे हीं ग्राहक ने अंदर कदम रखा, राबिया उठकर खड़ी हो गई और बोली,आओ भले आदमी, आपका स्वागत है | पाप के इस घर में मुझे हमेशा याद रहता है की परमात्मा हर जगह मौजूद है | वह सब कुछ देखता है और जो चाहे कर सकता है | आपका इस बारे में क्या ख्याल है ?
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 यह सुनकर वह आदमी हक्का बक्का रह गया और उसे कुछ समझ न आई की क्या करे ? आखिर वह कुछ हिचकिचाते हुए बोला, हाँ पंडित और मौलवी कुछ ऐसा ही कहते है |राबिया कहती गई, 'यहाँ गुनाहो से घिरे इस घर में, में कभी नही भूलती की ख़ुदा सब गुनाह देखता है और पूरा न्याय भी करता है वह हर इंसान को उसके गुनाहो की सजा देता है | जो लोग यहाँ आकर गुनाह करते है, उसकी सजा पाते है | उन्हें अनगिनत दुःख और मुसीबत झेलनी पड़ती है | मेरे भाई, हमे मनुष्य जन्म मिला है भजन बंदगी करने के लिए दुनिया के दुखो से हमेशा के लिए छुटकारा पाने के लिये, ख़ुदा से मुलाकात करने के लिए, न की जानवरो से भी बदतर बनकर उसे बर्बाद करने के लिए |
पहले आये लोगो की तरह इस आदमी को भी राबिया की बातो में छुपी सच्चाई का अहसास हो गया | उसे जिंदगी में पहली बार महसूस हुआ की वह कितने घोर पाप करता रहा है और आज फिर करने जा रहा था | वह फूटफूट कर रोने लगा और राबिया के पाव पर गिरकर माफ़ी मांगने लगा|
राबिया के शब्द इतने सहज, निष्कपट और दिल को छु लेने वाले थे की उस कोठे के मालिक की पत्नी भी बाहर आकर अपने पापो का पश्चाताप करने लगी | फिर उसने कहा ऐ नेक पाक लड़की, तुम तो वास्तव में फ़क़ीर हो | हमने कितना बड़ा गुनाह तुम पर लादना चाहा | इसी वक्त इस पाप की दलदल से बहार निकल जाओ ' इस घटना ने उसकी अपनी जिंदगी को भी एक नया मोड़ दे दिया और उसने पाप की कमाई हमेशा के लिए छोड़ दी |

कुल मलिक के सच्चे भक्त जहां कही भी हो, जिस हालात में हो, वे हमेशा मनुष्य जन्म के असली उद्देश्य की ओर इशारा करते है और भूले भटके जीवो को नेकी की रह पर चलने की प्रेरणा देते है

राधास्वामी जी
Share kren babaji ki sakhi Radha Soami ji


Relation Between Me And My Master। Authored By Saurabh Sharma

Relation between me and my Master

Two words about article
Originaly authored by Mr. Saurabh Sharma a young , talented , dedicated writer. And published to appreciate and encourage his precious work. Do share to encourage his as well



“Guru Gobind Do Khade Kake Lagoon Paun,

Balihari Guru Apke Jo Gobind Diyo Bataye”

                        -Saint Kabir Jee



The term master signifies someone, who is knowledgeable and responsible for
transmission of that knowledge with the zealous pupil. But in this context, I shall
qualify an adjective before it, i.e. ‘Spiritual’. The relation is therefore between me
and my spiritual master. The spiritual master is one who not only educates his
keen followers about the importance and purpose of one’s life but also create a
bond between themselves. This bond is of special importance, though many
scriptures and holy books around the world have already talked about it. It is this
bond which though forged in material world, had hardly to do anything with this
material world. Rather it thrust for higher threshold, which galvanizes its
significance.
Before I mark upon what relation exist between me and my master, it is in the
fitness of things to make a mention that “what role does he play”. I would like to
reiterate that main role of any spiritual master is to educate his follower that there
is certain importance and purpose of life. This line would surely add to the
curiosity of the follower, that what does master mean by importance and purpose.
The master goes on to tell his keen follower as to how to lead one’s own life, what
is the main purpose, why are we target and what will we achieve after it. The
role then gets more complicated because more curiosity arises as between the
follower to know more and feel whatever his master says within himself. It is this feeling which brings him closer to his master (I don’t want to sound gender bias, so
please take a note ‘him’ also refer to ‘her’). The experience he talks about is
unmatched and unparalleled, as it centers within the domain of one’s own physical
being. It is only then; one realizes that master is playing too many roles, without
being noticed by the world. Some see it as reflection of god, some as parents, and
some as friends and so on and so forth. It is within this role, he makes certain
unilateral promise which brings me closer to him.
His aura is second to none, because he works like a magnet and the beauty lies in
his presence. For some it may be physical but for some it is just more than physical
presence. It is in this light that the role of master gets more diverse and also
onerous to understand. His presence becomes gift for us. His blessing is a sole
moto of our life. Above all, followers try to accept various phases and perspective
of their life, without questioning it. It is so because, they realizes that master would
always wish for their best and they don’t try to reason it out by cursing others or
himself for his fate. Then one reaches to that intellect to realize that he is a true
reflection of god, because without asking for anything (except for our own well-
being) he gives us too much in return. When we delve further, we realize a
profound love and that love is a reason for our existence.
“Love is god, and god is love”
That said, it brings me to another important facet, i.e. my relation with spiritual
master. It would be gross injustice, to bring out my relation with him in a particular
forms expressed through words and language, because it transcend all sorts of
physicality. It is not just the physical existence rather my own consciousness which
owes everything to him. Therefore every word about my relation with him is reflection of that.
For me, the relation with my spiritual master is crystal clear. It goes like this “One
is a source and other reflection of that”. It means he is the reason of my existence
and if I could evoke a term my to assume ‘my own identity’, it is because of him.
Therefore our relation is pious. He has been power of love and I have been its
recipient and it is me who owe him.
But to understand it more properly, I would like to refer to him as my father. But
some may argue that how can we say some one as our father, in spite of the fact
that he is not genetically related or charged with fostering our physical growth or
well-being. Well to me father is someone who shoulders the burden of our
responsibility, so that we can become stronger to realize our motive and offer same
care and affection to our descendant. Here care and growth need not necessarily be
our physical growth but it could also be our spiritual growth and it is in this context
my spiritual master happens to be my father. He has given us purpose for our life
by nurturing our soul and making us realize that ‘what we have lost so far’. He
promises to stand by us in every single time, even though hardships are its peaks.
The very reason, we feel comfortable about our life as to its sequence, uncertainty
and end result is because of him. As a father, his role just don’t end there as like
every father he is also full of hope, that we his children won’t disappoint him and
discharge our duty in the light and spirit of his guidance and instruction. His
happiness is attached to our well-being, and it’s our spiritual upliftment for which
he cares the most.
Keeping these narratives in mind, I want to sum up my submission by deciphering
what Saint Kabir Jee said (as mentioned above opening para) that one’s it
happened that my master and my lord were standing before me to meet me, and I
have to choose whose feat should I touch first (an Indian custom of greeting our
elder with respect for their blessings) and at that moment I realize that I should touch the feat of my master. The reason on which he relied was that, one is a
means (spiritual master, i.e. in this case Guru) and the other an end in itself (god
himself, i.e. in this case ‘Gobind’) and it is because of this means only I was able
to reach that goal or end.
Babaji ki pyari sad sangat ko Radha Soami g

Satsang dera beas 2/07/2017 | सत्संग डेरा ब्यास


Satsang Dera Beas 2/07/2017

जो भाई बहन आज दिनांक 2 जुलाई 2017 का *बाबा* *जी* का सतसंग किसी कारणवश attend नहीं कर पाये उनके लिये ----

 १. जो जीव आत्माएं *बाबा* *जी* का आज का सतसंग नहीं सुन पाए वो एक विशेष रूहानी अनुभव से वंचित रह गये जिस अनुभव को शब्दों में ब्यान करना नामुमकिन है !
 २. आमतौर पर *बाबा* *जी* स्टेज पर चौकडी लगा कर सतसंग फरमाते है मगर आज उन्होंने स्टेज पर रखी कुर्सी पर बैठकर सतसंग फरमाया !
३. *बाबा* *जी* आमतौर पर डेढ घंटा सतसंग फरमाते हैं मगर आज उन्होंने आधा ही वक्त यानि सिर्फ ४५ मिनट ही सतसंग फरमाया !
४. आज *बाबा* *जी* ने सतसंग के लिये कोई शब्द नहीं लिया ! आज उन्होंने " विश्वास "  को अपने सतसंग का विषय बनाते हुए फरमाया कि हम जीवों को ना तो उस *कुल* *परमात्मा* पर विश्वास है ना ही अपने *गुरू* पर और ना ही अपने आप पर ! हम सिर्फ सुनी सुनाई पढी पढाई बातो पर विश्वास करते हैं ! खुद का कोई अनुभव नहीं जो इस विश्वास को मज़बूत कर सके !
५. *बाबा* *जी* ने फरमाया कि संतो का काम संगत को एक कार्यावाही से हटाकर दूसरी कार्यावाही में लगा देना नहीं होता ! पूरा सतसंग तो कोई विरला ही सुनता है वरना लोग सतसंग के बीच में से ही उठकर जाने लगते हैं और कुछ तो सतसंग के बीच में ही सो जाते हैं ! लोग सतसंग सुनने के लिए कम और snack bar में पकवान खाने की मंशा से अधिक आते हैं ! ६. *बाबा* *जी* फरमाया कि गिनती तो सियासतदानों के लिए महत्तवपूर्ण होती है ! संत महात्मा संगत की गिनती नहीं quality देखते हैं !
७. आगे *बाबा* *जी* ने फरमाया कि जितने मर्ज़ी सतसंग सुन लो , जितनी मर्ज़ी बाहरी सेवा कर लो , जितने मर्ज़ी ग्रंथ पोथियां पढ लो .. जब तक गुरू के बताए मार्ग ( भजन सिमरन ) पर नहीं चलते , गुरु की खुशी हासिल नहीं कर सकते !
८. *बाबा* *जी* ने फरमाया कि कुछ लोग मुझसे सवाल करते हैं कि आप जो सतसंग की शुरूआत में जो मत्था टेकते हो क्या वो ritual ceremony जैसा नहीं ? मगर वो ये नहीं पूछते कि मैं माथा टेकता किसको हूं ?  *सतगुरू* ने फरमाया कि मैं संगत में जो परम पिता परमात्मा बिराजमान है उसको मत्था टेकता हूं !
 ९. *सतगुरू* ने फरमाया कि जीवों के *कुल* *मालिक* ने जो बख्शा है उसका कभी शुक्रिया अदा नहीं करते , और मांगने पर ही सारा ज़ोर रहता है ! *बाबा* *जी* ने फरमाया कि जब तक कार का ड्राईवर कहीं ले चलने को तैयार ना हो , आप कितनी बडी कार में क्यों ना बैठे रहो अपनी मंज़िल पर नहीं पहुंच सकते !
१०. सतसंग के अंत में हर बार *सतगुरू* अगले सतसंग की announcement करते हुये फरमाते हैं कि जिन्होंने भी आना हो बडी खुशी से आ सकते हैं मगर इस बार उन्होंने बिना कुछ बताए " *राधा* *स्वामी* कहकर सतसंग समाप्त कर दिया !
भूल चूक के लिए प्यारे *सतगुरू* से क्षमाप्रार्थी  🙏🙏🙏🙏🙏

प्राथमिकता। Kahani Hirni Aur Shikari Ki। Radha Soami Sakhi


Prathmikta| Radha soami sakhi

किसी जंगल मे एक गर्भवती हिरणी थी जिसका प्रसव होने को ही था . उसने एक तेज धार वाली नदी के किनारे घनी झाड़ियों और घास के पास एक जगह देखी जो उसे प्रसव हेतु सुरक्षित स्थान लगा.
अचानक उसे प्रसव पीड़ा शुरू होने लगी, लगभग उसी समय आसमान मे काले काले बादल छा गए और घनघोर बिजली कड़कने लगी जिससे जंगल मे आग भड़क उठी .
वो घबरा गयी उसने अपनी दायीं और देखा लेकिन ये क्या वहां एक बहेलिया उसकी और तीर का निशाना लगाये हुए था, उसकी बाईं और भी एक शेर उस पर घात लगाये हुए उसकी और बढ़ रहा था अब वो हिरणी क्या करे ?,
वो तो प्रसव पीड़ा से गुजर रही है ,
अब क्या होगा?,
क्या वो सुरक्षित रह सकेगी?,
क्या वो अपने बच्चे को जन्म दे सकेगी ?,
क्या वो नवजात सुरक्षित रहेगा?,
या सब कुछ जंगल की आग मे जल जायेगा?,
अगर इनसे बच भी गयी तो क्या वो बहेलिये के तीर से बच पायेगी ?
या क्या वो उस खूंखार शेर के पंजों की मार से दर्दनाक मौत मारी जाएगी?
जो उसकी और बढ़ रहा है,
उसके एक और जंगल की आग, दूसरी और तेज धार वाली बहती नदी, और सामने उत्पन्न सभी संकट, अब वो क्या करे?

लेकिन फिर उसने अपना ध्यान अपने नव आगंतुक को जन्म देने की और केन्द्रित कर दिया .
फिर जो हुआ वो आश्चर्य जनक था .
कडकडाती बिजली की चमक से शिकारी की आँखों के सामने अँधेरा छा गया, और उसके हाथो से तीर चल गया और सीधे भूखे शेर को जा लगा . बादलो से तेज वर्षा होने लगी और जंगल की आग धीरे धीरे बुझ गयी.
इसी बीच हिरणी ने एक स्वस्थ शावक को जन्म दिया .
ऐसा हमारी जिन्दगी मे भी होता है, जब हम चारो और से समस्याओं से घिर जाते है, नकारात्मक विचार हमारे दिमाग को जकड लेते है, कोई संभावना दिखाई नहीं देती , हमें कोई एक उपाय करना होता है.,
उस समय कुछ विचार बहुत ही नकारात्मक होते है, जो हमें चिंता ग्रस्त कर कुछ सोचने समझने लायक नहीं छोड़ते .
ऐसे मे हमें उस हिरणी से ये शिक्षा मिलती है की हमें अपनी प्राथमिकता की और देखना चाहिए, जिस प्रकार हिरणी ने सभी नकारात्मक परिस्तिथियाँ उत्पन्न होने पर भी अपनी प्राथमिकता "प्रसव "पर ध्यान केन्द्रित किया, जो उसकी पहली प्राथमिकता थी. बाकी तो मौत या जिन्दगी कुछ भी उसके हाथ मे था ही नहीं, और उसकी कोई भी क्रिया या प्रतिक्रिया उसकी और गर्भस्थ बच्चे की जान ले सकती थी
उसी प्रकार हमें भी अपनी प्राथमिकता की और ही ध्यान देना चाहिए .
हम अपने आप से सवाल करें,
हमारा उद्देश्य क्या है, हमारा फोकस क्या है ?,
हमारा विश्वास, हमारी आशा कहाँ है,
ऐसे ही मझधार मे फंसने पर हमें अपने इश्वर को याद करना चाहिए ,
उस पर विश्वास करना चाहिए जो की हमारे ह्रदय मे ही बसा हुआ है .
जो हमारा सच्चा रखवाला और साथी है..
Achi lagi ho to share jrur kren. Radha soami g

शब्द और नाम की कमाई। Radha soami sakhi


Shabad aur naam ki kmai

शब्द और नाम की कमाई के बिना कोई उपाय नहीं है कि हम देह के बंधनों से छुटकारा पा सकें इसलिए सभी संत महात्मा केवल नाम का प्रचार एवं प्रसार करते हैं।
Also read - पूरा गुरु
गुरूमुखों की महिमा है नाम की कमाई करने से उनकी होंमैं की, मोह माया की बीमारी दूर हो जाती है। उनका मन निर्मल हो जाता है जिसके फलस्वरूप वह गुरूमुख बन जाते हैं या यूं कहा जा सकता है वह सच्चे गुरूमुख हो जाते हैं और उनका जन्म मरण के दुखों से सदा के लिए छुटकारा हो जाता है।
संत सतगुरु हमारे ख्यालों को नाम के साथ जोड़कर हमें देह के बंधनों से आजाद करके वापिस उस परमात्मा के साथ मिला देते है।
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏