पूरा गुरु। साखी कबीर जी की। Radha Soami Sakhi

यही हैं कर्मों की नेकी

एक राजा ने कबीर साहिब जी से प्रार्थना की किः 
"आप दया करके मुझे साँसारिक बन्धनों से छुड़ा दो।"

तो कबीर जी ने कहाः 
"आप तो हर रोज पंडित जी से कथा करवाते हो, सुनते भी हो...?"

"हाँ जी महाराज जी ! कथा तो पंडित जी रोज़ सुनाते हैं, 
विधि विधान भी बतलाते हैं,
लेकिन अभी तक मुझे भगवान के दर्शन नहीं हुए ,आप ही कृपा करें।"

कबीर साहिब जी बोले
"अच्छा मैं कल कथा के वक्त आ जाऊँगा।"

अगले दिन कबीर जी वहाँ पहुँच गये, जहाँ राजा पंडित जी से कथा सुन रहा था। 
राजा उठकर श्रद्धा से खड़ा हो गया, तो कबीर जी  बोले--

"राजन ! अगर आपको प्रभु का दर्शन करना है तो आपको मेरी हर आज्ञा का पालन करना पड़ेगा।"

"जी महाराज मैं आपका हर हुक्म  मानने को तैयार हूँ जी !

राजन अपने वजीर को हुक्म दो कि वो मेरी हर आज्ञा का पालन करे।"

राजा ने वजीर को हुक्म दिया कि कबीर साहिब जी जैसा भी कहें, वैसा ही करना।
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कबीर जी ने वज़ीर को कहा कि एक खम्भे के साथ राजा को बाँध दो  और दूसरे खम्भे के साथ पंडित जी को बाँध दो। राजा ने तुरंत वजीर को इशारा किया कि आज्ञा का पालन हो। दोनों को दो खम्भों से बाँध दिया गया। 

कबीर जी ने पंडित को कहा-
"देखो, राजा साहब  बँधे हुए हैं, उन्हें तुम खोल दो।"

पंडित हैरान हो कर बोला-
महाराज ! मैं तो खुद ही बँधा हुआ हूँ। उन्हें कैसे खोल सकता हूँ भला ?"

फिर कबीर जी ने राजा से कहाः 
"ये पंडित जी ,तुम्हारे पुरोहित हैं। वे बँधे हुए हैं। उन्हें खोल दो।"

राजा ने बड़ी दीनता से कहा
"महाराज ! मैं भी बँधा हुआ हूँ, भला उन्हें कैसे खोलूँ ?"

तब कबीर साहिब जी ने सबको समझायाः

*बँधे को बँधा मिले छूटे कौन उपाय*
*सेवा कर निर्बन्ध की, जो पल में लेत छुड़ाय*

'जो पंडित खुद ही कर्मों के बन्धन में फँसा  है, 
जन्म-मरण के बन्धन से छूटा नहीं, 
भला वो तुम्हें कैसे छुड़ा सकता है ।

अगर तुम सारे बंधनों से छूटना चाहते हो तो 
किसी ऐसे प्रभु के भक्त के पास जाओ ,
जो जन्म-मरण के बंधनों से छूट चुका हो 
केवल एक सन्त सदगुरु ही सारे बन्धनों से 
आज़ाद होते हैं। वही हमें इस चौरासी के 
जेलखाने से आज़ाद होने की चाबी देते हैं ।

परमात्मा के महल पर लगा ताला कैसे खुलेगा, 
इसकी युक्ति भी समझाते हैं ।
जो उनका हुक्म मान कर हर रोज़ प्रेम से बन्दग़ी करता है
वो सहज ही परमधाम में पँहुच जाता है जी ।

आदर्श शिष्य। Adarsh Shishya। Radha soami sakhi

विदेशी सत्संगियो की एक मीटिंग में किसी ने सवाल पूछा।,”क्या बड़े महाराज जी आपके पितामह थे ?” “हां” महाराज जी ने जवाब दिया,और फिर बड़ा जोर देकर बोले, “लेकिन वे मेरे सतगुरु भी थे ,और यही ज्यादा महत्वपूर्ण है । ” यह उत्तर बड़े महाराज जी के साथ उनके सम्बन्धो के बारे में बहुत कुछ प्रकट करता है । जब भी वे बड़े महाराज जी की बात करते है,उनकी आँखे भर आती है और गला रुंध जाता है। ऐसा अक्सर बातचीत के दौरान ,और खासकर जब वे सत्संग में बड़े महाराज जी का कोई जिक्र् करते है ,होता है । ऐसा गहरा है उनका प्रेम अपने प्यारे के प्रति ।

चरित्र। Radha soami sakhi

मानव जीवन की स्थायी निधि है चरित्र
सद्भावना के लिए आवश्यक है चरित्र। सद्विचारों और सत्कर्मों की एकरूपता ही चरित्र है। जो अपनी इच्छाओं को नियंत्रित रखते हैं और उन्हें सत्कर्मों का रूप देते हैं, उन्हीं को चरित्रवान कहा जा सकता है। संयत इच्छाशक्ति से प्रेरित सदाचार का नाम ही चरित्र है।चरित्र मानव जीवन की स्थायी निधि है। जीवन में सफलता का आधार मनुष्य का चरित्र ही है। चरित्र मानव जीवन की स्थायी निधि है। सेवा, दया, परोपकार, उदारता, त्याग, शिष्टाचार और सद्व्यवहार आदि चरित्र के बाह्य अंग हैं, तो सद्भाव, उत्कृष्ट चिंतन, नियमित-व्यवस्थित जीवन, शांत-गंभीर मनोदशा चरित्र के परोक्ष अंग हैं। किसी व्यक्ति के विचार इच्छाएं, आकांक्षाएं और आचरण जैसा होता है, उन्हीं के अनुरूप चरित्र का निर्माण होता है।

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त्तम चरित्र जीवन को सही दिशा में प्रेरित करता है। चरित्र निर्माण में साहित्य का बहुत महत्व है। विचारों को दृढ़ता और शक्ति प्रदान करने वाला साहित्य आत्म निर्माण में बहुत योगदान करता है। इससे आंतरिक विशेषताएं जाग्रत होती हैं। यही जीवन की सही दिशा का ज्ञान है।मनुष्य जब अपने से अधिक बुद्धिमान, गुणवान, विद्वान और चरित्रवान व्यक्ति के संपर्क में आता है, तो उसमें स्वयं ही इन गुणों का उदय होता है। वह सम्मान का पात्र बन जाता है। जब मनुष्य साधु-संतों और महापुरुषों की संगति में रहता है, तो यह प्रत्यक्ष सत्संग होता है, किंतु जब महापुरुषों की आत्मकथाएं और श्रेष्ठ पुस्तकों का अध्ययन करता है, तो उसे परोक्ष रूप से सत्संग का लाभ मिलता है, जो सद्भावना के लिए आवश्यक है। मनुष्य सत्संग के माध्यम से अपनी प्रकृति को उत्तम बनाने का प्रयत्न कर सकता है, जिससे सद्भावना कायम रखी जा सके।

एक ही परमात्मा। कहानी समरद की। Radha Soami Sakhi


Ek hi Parmatma। Radha Soami Sakhi

एक मुसलमान फकीर हुआ, सरमद। सरमद के जीवन में एक बड़ी मीठी घटना है। सरमद पर, जैसा कि सदा होता है, उस जमाने के मौलवियों ने एक मुकदमा चलवाया। पंडित सदा से ही संत के विरोध में रहा है। सरमद पर एक मुकदमा चलवाया, सम्राट के दरवाजे पर सरमद को बुलवाया गया। मुसलमानों में एक सूत्र है। वह सूत्र यह है कि एक ही अल्लाह है और कोई अल्लाह नहीं उसके सिवाय, और एक ही पैगंबर है उसका, मुहम्मद। लेकिन सूफी फकीर इसमें से आधा हिस्सा छोड़ देते हैं। वे पहला हिस्सा तो कहते हैं कि एक परमात्मा के सिवाय और कोई परमात्मा नहीं है। दूसरा हिस्सा कि उसका एक ही पैगंबर है मुहम्मद, यह वे छोड़ देते हैं। क्योंकि वे कहते हैं कि उसके बहुत पैगंबर हैं। इसलिए सूफियों के खिलाफ सदा से ही मुस्लिम थियोलाजी जो है वह सदा से सूफियों के खिलाफ रही है। सरमद तो और भी खतरनाक था। वह सूफियों के इस पूरे सूत्र को भी पूरा नहीं कहता था। इसमें से भी आधा उसने छोड़ दिया था। सूत्र है कि एक ही परमात्मा के सिवाय कोई परमात्मा नहीं। वह सिर्फ इतना ही कहता था, कोई परमात्मा नहीं— आखिरी हिस्से को।



अब यह तो हद हो गई। मुहम्मद को छोड़ दो चलेगा। तब तक भी आदमी नास्तिक नहीं हो जाता। सिर्फ इतना ही है कि मुसलमान नहीं रह जाता। और मुसलमान न रह जाने से कोई धार्मिक नहीं रह जाता, ऐसी कोई बात नहीं है। लेकिन इस सरमद के साथ क्या करोगे? यह कहता है, कोई परमात्मा नहीं।

तो सरमद को दरबार में ले जाया गया। और सम्राट ने पूछा, सरमद, क्या तुम ऐसी बात कहते हो कि कोई परमात्मा नहीं? सरमद ने कहा, कहता हूं। और उसने जोर से दरबार में कहा, कोई परमात्मा नहीं। सम्राट ने कहा, तुम नास्तिक हो क्या? 

उसने कहा, नहीं, मैं नास्तिक नहीं हूं। लेकिन अभी तक मुझे किसी परमात्मा का कोई पता नहीं चला, तो मैं कैसे कहूं। जितना मुझे पता चला है, उतना ही कहता हूं। इस सूत्र में मुझे आधे का ही पता है अभी कि कोई परमात्मा नहीं। आधे का मुझे कोई पता नहीं। जिस दिन पता हो जाएगा, उस दिन कह दूंगा। और जब तक पता नहीं है, तब तक झूठ कैसे बोलूं! और धार्मिक आदमी झूठ तो नहीं बोल सकता। बड़ी मुश्किल खड़ी हो गई। आखिर उसको फांसी की सजा दी गई। और दिल्ली की जामा मस्जिद के सामने उसकी गरदन काटी गई।



यह कहानी नहीं है। हजारों —लाखों लोगों ने उस भीड़ में उसकी फांसी को देखा। उसकी गरदन काटी गई मस्जिद के दरवाजे पर और मस्जिद की सीढ़ियों से उसकी गरदन नीचे गिरी और उसके कटे हुए सिर से आवाज निकली, एक ही परमात्मा है, उसके सिवाय कोई परमात्मा नहीं।

तो जो लाखों लोग भीड़ में उसके प्यार करने वाले खड़े थे, उन्होंने कहा, पागल सरमद, अगर इतनी ही बात पहले कह दी होती! पर सरमद ने कहा, जब तक गरदन न कटे, तब तक उसका पता कैसे चले। जब पता चला, तब मैं कहता हूं कि परमात्मा है, उसके सिवाय कोई परमात्मा नहीं। लेकिन जब तक मुझे पता नहीं था, तब तक मैं कैसे कह सकता था।

कुछ सत्य हैं जो हमें गुजर कर ही पता चलते हैं। मृत्यु का सत्य तो हमें मृत्यु से गुजर कर ही पता चलेगा। लेकिन उसका पता चल सके, इसकी तैयारी हमें जिंदगी में ही करनी पड़ेगी। मरने की तैयारी भी जिंदगी में करनी पड़ती है। और जो आदमी जिंदगी में मरने की तैयारी नहीं कर पाता, वह बड़े गलत ढंग से मरता है। और गलत ढंग से जीना तो माफ किया जा सकता है, गलत ढंग से मरना कभी माफ नहीं किया जा सकता। क्योंकि वह चरम बिंदु है, वह आखिरी है, वह जिंदगी का सार है, निष्कर्ष है। अगर जिंदगी में छोटी —मोटी भूलें यहां —वहा की हों तो चल सकता है, लेकिन आखिरी क्षण में तो भूल सदा के लिए थिर और स्थायी हो जाएगी।

राधा सवामी जी
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सांस जरूरी या परमात्मा। Radha Soami Sakhi

एक समय की बात है। किसी महात्मा के पास एक लड़का आया और बोला कि मुझे भी परमात्मा से मिला दो मैं भी उसे देखना चाहता हूं।

महात्मा बोले," ये तेरे बस की बात नहीं है, तुझे अभी सिर्फ चाव है प्रेम नही।"

लड़का, " मैं कुछ नहीं जानता आप मुझे भी दिखाओ परमात्मा, मैं भी तो देखूं क्या है वो"

महात्मा, " बेटा ये कोई खेल नहीं है, इसमे खुद को गवाना पड़ता है"

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लड़का," कोई बात नही बाबा मैं तैयार हूं।"

महात्मा ," अच्छा, चलो पर तुम्हे खुद को भी त्यागना पड़ेगा याद रखना।"

लड़का," हां बाबा"

महात्मा उसको एक सरोवर में ले गए और बोले कि चलो स्नान करलो,
वो कुंड में उतर गया"

महात्मा ने उसकी गर्दन पकड़ कर उसे कुंड में डुबो दिया, वो छटपटाने लगा, बाहर निकाला तो बोला," मुझे सांस नही आ रही,
महात्मा बोले," ऐसे ही मिलेगा परमात्मा" और उसे फिर डुबो दिया।
दोबारा बाहर निकाला तो बोला," बस करो मेरी सांस नही आ रही"

महात्मा बोले, " अब बता सांस चाहिए या परमात्मा।
वो उखड़ी हुई सांस लेते हुए बोला ," सांस चाहिए।

महात्मा बोले," जब तुम्हारे लिए सांस से ज्यादा परमात्मा प्यारा हो जाये तो मेरे पास आ जाना"

यही हाल हमारा है। हम परमात्मा को पाना तो चाहते है पर कुर्बान कुछ नही करना चाहते। और बिना कुर्बानी के कभी परमात्मा कभी नही मिलता।
कुर्बान करना है तो इच्छाओं का करो, लालच का करो, काम क्रोध का करो, मोह का करो, अहंकार का करो। तब देखना तुम्हारा रास्ता कितना आसान हो जाता है।


सेवा का मूल्य । Radha Swami sakhi

एक सत्संगी महिला ने महाराज जी से एक बार पूछा की उसकी अपनी कोई आमदनी नहीं है और उसे सेवा देने के लिए हमेशा अपने पति से रुपया मांगना पड़ता है; क्या ऐसी सेवा का उसको लाभ मिलेगा ? क्या ऐसी सेवा का कोई मूल्य है ?

महाराज जी ने उत्तर दिया, “हाँ,अगर आप दोनों सेवा देने में खुश है महाराज जी ने एक लंगड़े सत्संगी का उदारहण देकर इस बात को समझाया,”वह लंगड़ा सत्संगी भंडारों पर हिमाचल प्रदेश के पहाड़ो से आता था और गरीब था । वह 75 मील बैसाखी के सहारे पैदल चलकर आता था,ताकि सेवा में देने के लिए रूपया बचा सके। उसे श्री बुलाकानी एक दिन घन की सेवा के समय मेरे पास लाये । उसने एक रूपया सेवा में दिया । उसकी गरीबी देखते हुए मेने सेवादारो से उसकी सेवा लेने को मना किया,इस पर वह रोने लगा,और मुझे उसकी सेवा मंजूर करनी पडी ।”
महाराज जी ने पूछा ,” क्या इस सेवा की कीमत आंकी जा सकती है? क्या यह धनवानों के दिए हुए हज़ारो -लाखो रुपयो से ज्यादा कीमती नहीं है ? सेवा का मूल्य इससे नहीं आँका जा सकता की आपने क्या दिया है ; उसकी कीमत तो उस प्रेम की भावना में है जिसके साथ वह सेवा दी गयी है ।”

जो हाथ से चला गया उसका दुख क्या करना।

जो हाथ से चला गया उसका दुख क्या करना! 

एक आदमी तड़के नदी की ओर जाल लेकर जा रहा था।  नदी के पास पहुंचने पर उसे आभास हुआ कि सूर्य अभी पूरी तरह बाहर नहीं निकला हैं।  घने अंधेरे में वह मस्ती से टहलने लगा।

तभी उसका पैर झोले से टकराया। उत्सुकतापूर्वक उसने झोले में हाथ डाला तो पाया कि उसमें बहुत बड़े-बड़े चमकीले पत्थर भरे पड़े हैं। समय बिताने के लिए उसने झोले में से एक-एक पत्थर निकाला और नदी में फेकता गया। धीरे-धीरे उसने झोले के कई पत्थर नदी में फेक दिए , जब अंतिम पत्थर उसके हाथ में था तभी सूर्य की रोशनी धरती पर फैल गई।
सूर्य के प्रकाश में उसने देखा कि उसके हाथ में बचा अंतिम पत्थर बहुत तेज चमक रहा था। उस पत्थर की चमक देखे वह दंग रह गया। क्योकि वह पत्थर नही बल्कि अनमोल हीरा था। उसे एहसास हुआ कि अब तक वह करोड़ों के पत्थर नदी में फेक चुका था। वह फूट-फूटकर रोने लगा


उसके हाथ में बचे अंतिम पत्थर को देख कर वह अंधेरे को कोस रहा था। वह नदी के किनारे शोकमग्न बैठा था कि इतने में वहां से एक महात्मा गुजरे। उसका दुख जानकर वे बोले-बेटे रोओ मत, तुम अब भी सौभाग्यशाली हो। यह तुम्हारा सौभाग्य ही है कि अंतिम पत्थर फेंकने से पहले ही सूर्य की रोशनी फूट पड़ी, वरना यह पत्थर भी तुम्हारे हाथों से निकल जाता। यह एक मूल्यवान हीरा भी तुम्हारी जिंदगी संवार सकता है।
जो चीज हाथ से निकल गई, उसे लेकर रोने कि बजाय जो तुम्हारे हाथ में है तुम्हें उसका उत्सव मनाना चाहिए। महात्मा की बात सुनकर उसकी आंखे खुल गई और वह खुशी- खुशी घर लौट आया।  जो गुजर गया उसे देखने की बजाय यह देखा जाए कि आगे क्या हो सकता है।‪
#शिक्षा‬- जो चीज हाथ से निकल गई,उसे लेकर रोने की बजाय जो हाथ में है उसका उत्सव मनाना चाहिए और भविष्य के बारे में सोचना चाहिए।...

सेवा का सौभाग्य। Radha Soami Sakhi

एक बार की घटना है बाबा जी कहीं पर कुछ काम करवा रहे थे संगत सेवा कर रही थी । 
डेरे के कुछ बड़ बड़े जत्थेदार और औहदेदार भी वहां मौजूद थे सेवा समाप्त होने के बाद सब सेवादार वहां से चले गए  ।
एक को छोड़ कर बाबा जी भी जब वहां से चलने लगे तो उन प्रबंधकों से बोले
इस सेवादार को भी गाड़ी में बिठा लो। 
वहां पर मौजूद लोग एक दुसरे का मुंह देखने लगे।
आखिर बाबा जी इस सेवादार को साथ क्यों ले जा रहे हैं…!!
अब गुरु का आदेश था तो उस सेवादार को साथ ले लिया । लेकिन अब गाड़ी में
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बैठने की जगह नहीं थी सेवादार ने कहा कोई बात नहीं दास आपके चरणों में नीचे ही बैठ जाएगा और वो नीचे ही बैठ गया और गाड़ी चल
पड़ी 
तभी किसी ने उस से व्यंग्य से पूछा क्यों भाई साहब आप केवल सेवा ही करते हो या कोई काम धंधा भी है….!! 
यह सुन कर वह सेवादार मुस्कराया और उस ने हाथ जोड़ कर बड़ी ही विनम्रता से कहा….!!
” दास तो सुप्रीम कोर्ट का एक छोटा सा जज है । सेवा का सौभाग्य तो कभी कभी हजूर सच्चे पातशाह की कृपा से बड़ी मुश्किल से ही मिलता है।” सभी एक दम अपनी सीटों से खड़े हो गये और उस सेवादार को सीट देने लगे। बाबा जी भी अपने शिष्यों को क्या क्या और कैसे कैसे सीख देते हैं
बात ये नहीं कि की आप क्या हो। सेवा में जाकर आप सेवक हो, क्योंकि से सौभाग्य किसी किसी को मिलता है

जानिए कैसे करना है भजन सिमरन। Radha soami sakhi



हम सबको भजन सिमरन करने का हुक्म है।
पर सही तरीका क्या है ? 
बाबाजी नामदान के वक्त सही तरीका समझाते है। आप भी पढ़ें और जाने

1. सिमरन हमेशा छुप कर करना चाहिए। खुद को ढक लेना चाहिए, ताकि हमें कोई देख न सके और हम बिना किसी बाधा के सिमरन कर सके।

2. सिमरन सुबह 3 बजे उठकर, नहा धोकर करना चाहिए, नहाना इसलिए जरूरी है ताकि सुस्ती न आ सके, और कोई खास कारण नही है।

3. रात को भोजन संयम से करना चाहिए ताकि ज्यादा नींद न आये और हम रात को भी सिमरन कर सकें।

4. खाना हमेशा शाकाहारी और हल्का फुल्का होना चाहिए, ताकि शरीर बीमारियों से बचा रहे।

5. किसी भी प्रकार के नशे का सेवन वर्जित है।

6. प्रेम करें, मोह नहीं।

7. अपने अन्दरूनी रहस्यों को कभी दूसरों को न बताएं, इससे आपकी ही दौलत कम होगी।

8. क्रोध को कोसों दूर रखें। क्रोध और सिमरन ये उलट है।


9. सतगुरु का चिंतन हमेशा करते रहे। एक पल के लिए भी नाम को न भूलें।

10. संयम से काम लें। परइस्त्री( परायी इस्त्री) पर कभी भी नजर न रखे। ये आपकी वर्षों की कमाई दौलत को मिट्टी कर सकता है। और आपको पीछे धकेल सकता है।
www.RadhaSoamiSakhi.org
11. कभी शिकायत न करें। जो मिल रहा है या मिलेगा सब आपके कर्मों का नतीजा है। और किये हुए कर्मों से तो भगवान भी नही बच सकते। विवेक से काम लें।

12. नियमित सत्संग सुने। सबको प्रेम करें पर कभी भी नास्तिक के साथ बहस न करें। उनकी संगत कम करें।

13. बच्चों को अच्छी शिक्षा दें। वो नए समाज की आधारशिला है। अपना योगदान दें।

14. रोज अपने वक्त में से 2.30 घंटे दें। अगर नया नया नाम दान लिया है तो धीरे धीरे समय बढ़ाएं।

15. रोज रात को खुद को पूछें कि आज आपने क्या अच्छा काम किया। इससे आपको दूसरों की मदद करने की प्रेरणा मिलेगा और आपकी तरक्की आसान होगी

अगर इन 15 सुनहरी नियमों का पालन करोगे तो परमात्मा आपसे दूर नही है। फिर जिंदगी से कोई शिकायत या शिकवा नही रहेगा।
राधा स्वामी जी सबके साथ शेयर करें

सत्संग में जाने के फ़ायदे। Radha soami sakhi


कीर्तन और सत्संग मे जाने से फ़ायदा ही फ़ायदा होता है।कभी नुकसान नही होता।एक अँधा फूलों के बाग में चला जाता है,
 अगर वह फूलों की खूबसूरती को नही देख सकता तो फूलों की सुगंध तो जरुर ले ही जायगा। 
जैसे एक पत्थर पानी में डूबा दो चाहे पिघलता नहीं पर कम से कम सूरज की तपिश से तो बचा रहता है।
इसी प्रकार अगर हम सत्संग में जा कर नाम की कमाई करते हैं तो सोने पे सुहागा है नही भी करते तो भी कम से कम बुरी संगत से तो बचे रहते हैं।



सत्संग वह आईना है।जहाँ पर सत्संगी अपने अवगुणों को देख कर सुधारने की कोशिश करता है।
और उसकी कोशिश ही उसे एक दिन गुरमुख बना देती है।हमारा खुद का सुधरना भी किसी सेवा से कम नहीं है।ये भी एक बन्दगी है।
                 - महाराज चरण सिंह जी


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गुरु पर विश्वास। Radha Soami Sakhi


करतार पुर में गुरु नानक साहेब जी के दर्शन करने के लिए एक दिन बहुत संगत आ गयी। उस टाईम वहाँ लंगर प्रसाद चल रहा था। आई हुई बहुत सी संगत की वजह से वहाँ लंगर प्रसाद कम पड़ने लगा। ये बात जब सेवक जी ने आ कर गुरु नानक महाराज जी को बताया तो, सतगुरु बाबा गुरु नानक जी ने उस सेवक को हुक्म किया की, कोई सिख सामने कीकर के वृक्ष पर चढ़ कर उसे हिलाओ उससे मिठाइयां बरसेंगी वो मिठाइयां आई संगत में बाँट दो। ये सुनकर गुरु पुत्र बाबा श्री चन्द जी और बाबा लक्षमी दास जी बोले, बाबा जी कीकर का तो अपना भी कोई फल नही होता बस कांटे ही काँटे होते है उससे कहाँ मिठाइयां बरसेंगी।
कुछ कच्ची श्रद्धा वाले भगत बोले – सारा संसार घूम घूम कर बज़ुर्गी में गुरु नानक साहेब जी सठिया गए है, भला कीकर से कभी मिठाइयां बरसी है?



ये सब बातें सुन रहे भाई लहणे को हुक्म हुआ, भाई लहणे तू चढ़, बिना इक पल की देर लगाए भाई लहणा कीकर पर चढ़ गए और भाई लहणा जोर जोर से कीकर को हिलाने लगे, दुनिया ने ये सब देखा, कीकर से मिठाइयां बरसी और वे सारी मिठाइयां सारी संगत खाई और जब सारी संगत त्रिपत हो गयी तो हुक्म हुआ।
लहणे अब तू नीचे आजा तो भाई लहणा बाबा जी के आदेश से नीचे आ गए।
गुरु नानक साहेब जी ने पूछा भाई लहणे को, जब किसी भी संत को इस बात पर भरोसा ही नही था की कीकर से मिठाइयाँ आएगी, तो तूने कैसे मुझ पे भरोसा किया… इस प्रसन्न के जवाब में भाई लहणे ने कहा सतगुरु जी, आप ने ही तो सिखाया है की कब, क्या, कैसे, क्यों, किन्तु, परन्तु, लेकिन ये शब्द सेवक के लिए नही बने।
मेरे आप के ऊपर के विशवास ने मुझे कहा कि जब बाबा जी ने कहा है, तो मिठाइयां जरूर बरसेंगी।
मेरा गुरु पूरा है। मेरा गुरु समर्थ है। मेरा गुरु सच्चा है। मेरी अक्ल् छोटी है पर मेरा गुरु कभी छोटा नहीं।
बाबा गुरु नानक साहेब जी ने जब ये सुना, ये सुनते ही भाई लहणे को छाती से लगा लिया। यही भाई लहणा गुरु अंगद साहेब बनकर गुरु नानक साहेब की गद्दी पर विराजमान हुए।।
राधा स्वामी जी


मृत्यु की तैयारी। Radha soami sakhi


गुरु नानक जी के पास सतसंग में एक छोटा लड़का प्रतिदिन आकर बैठ जाता था।
एक दिन नानक जी ने उससे पूछाः- “बेटा, कार्तिक के महीने में सुबह इतनी जल्दी आ जाता है, क्यों?”
वह छोटा लड़का बोलाः- “महाराज, क्या पता कब मौत आकर ले जाये?”
नानक जीः- “इतनी छोटी-सी उम्र का लड़का, अभी तुझे मौत थोड़े मारेगी?
अभी तो तू जवान होगा, बूढ़ा होगा, फिर मौत आयेगी।
लड़का बोलाः- “महाराज, मेरी माँ चूल्हा जला रही थी, बड़ी-बड़ी लकड़ियों को आग ने नहीं पकड़ा तो फिर उन्होंने मुझसे छोटी-छोटी लकड़ियाँ मँगवायी।
माँ ने छोटी-छोटी लकड़ियाँ डालीं तो उन्हें आग ने जल्दी पकड़ लिया।
इसी तरह हो सकता है मुझे भी छोटी उम्र में ही मृत्यु पकड़ ले, इसीलिए मैं अभी से सतसंग में आ जाता हूँ।”
इसलिए जल्दी से परमात्मा से प्रेम करके जीवन सफल बना लो इन स्वांसो से बडा दगाबाज कोइ नही है, कहीं बाद मे पछताना ना पडे 

कुर्बानी के बिना मालिक नहीं मिलता। Radha soami sakhi

संतों की एक सभा चल रही थी 

किसी ने एक दिन एक घड़े में गंगाजल भरकर वहां रखवा दिया ताकि संत जन जब प्यास लगे तो गंगाजल पी सकें

संतों की उस सभा के बाहर एक व्यक्ति खड़ा था. उसने गंगाजल से भरे घड़े को देखा तो उसे तरह-तरह के विचार आने लगे

वह सोचने लगा- अहा ! यह घड़ा कितना भाग्यशाली है !

एक तो इसमें किसी तालाब पोखर का नहीं बल्कि गंगाजल भरा गया और दूसरे यह अब सन्तों के काम आयेगा

संतों का स्पर्श मिलेगा, उनकी सेवा का अवसर मिलेगा. ऐसी किस्मत किसी किसी की ही होती है

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घड़े ने उसके मन के भाव पढ़ लिए और घड़ा बोल पड़ा- बंधु मैं तो मिट्टी के रूप में शून्य पड़ा था

किसी काम का नहीं था. कभी नहीं लगता था कि भगवान् ने हमारे साथ न्याय किया है

फिर एक दिन एक कुम्हार आया. उसने फावड़ा मार-मारकर हमको खोदा और गधे पर लादकर अपने घर ले गया

वहां ले जाकर हमको उसने रौंदा. फिर पानी डालकर गूंथा. चाकपर चढ़ाकर तेजी से घुमाया, फिर गला काटा. फिर थापी मार-मारकर बराबर किया

बात यहीं नहीं रूकी. उसके बाद आंवे के आग में झोंक दिया जलने को

इतने कष्ट सहकर बाहर निकला तो गधे पर लादकर उसने मुझे बाजार में भेज दिया. वहां भी लोग ठोक-ठोककर देख रहे थे कि ठीक है कि नहीं ?

ठोकने-पीटने के बाद मेरी कीमत लगायी भी तो क्या- बस 20 से 30 रुपये ! मैं तो पल-पल यही सोचता रहा कि हे ईश्वर सारे अन्याय मेरे ही साथ करना था

रोज एक नया कष्ट एक नई पीड़ा देते हो. मेरे साथ बस अन्याय ही अन्याय होना लिखा है ! भगवान ने कृपा करने की भी योजना बनाई है यह बात थोड़े ही मालूम पड़ती थी !

किसी सज्जन ने मुझे खरीद लिया और जब मुझमें गंगाजल भरकर सन्तों की सभा में भेज दिया. तब मुझे आभास हुआ कि कुम्हार का वह फावड़ा चलाना भी भगवान् की कृपा थी

उसका वह गूंथना भी भगवान् की कृपा थी

आग में जलाना भी भगवान् की कृपा थी और बाजार में लोगों के द्वारा ठोके जाना भी भगवान् की कृपा ही थी

अब मालूम पड़ा कि सब भगवान् की कृपा ही कृपा थी !

परिस्थितियां हमें तोड़ देती हैं. विचलित कर देती हैं- इतनी विचलित की भगवान के अस्तित्व पर भी प्रश्न उठाने लगते हैं क्यों हम सबमें शक्ति नहीं होती ईश्वर की लीला समझने की, भविष्य में क्या होने वाला है उसे देखने की

इसी नादानी में हम ईश्वर द्वारा कृपा करने से पूर्व की जा रही तैयारी को समझ नहीं पाते. बस कोसना शुरू कर देते हैं कि सारे पूजा-पाठ, सारे जतन कर रहे हैं फिर भी ईश्वर हैं कि प्रसन्न होने और अपनी कृपा बरसाने का नाम ही नहीं ले रहे

पर हृदय से और शांत मन से सोचने का प्रयास कीजिए, क्या सचमुच ऐसा है या फिर हम ईश्वर के विधान को समझ ही नहीं पा रहे ?

आप अपनी गाड़ी किसी ऐसे व्यक्ति को चलाने को नहीं देते जिसे अच्छे से ड्राइविंग न आती हो तो फिर ईश्वर अपनी कृपा उस व्यक्ति को कैसे सौंप सकते हैं जो अभी मन से पूरा पक्का न हुआ हो

कोई साधारण प्रसाद थोड़े ही है ये, मन से संतत्व का भाव लाना होगा

ईश्वर द्वारा ली जा रही परीक्षा की घड़ी में भी हम सत्य और न्याय के पथ से विचलित नहीं होते तो ईश्वर की अनुकंपा होती जरूर है. किसी के साथ देर तो किसी के साथ सवेर

यह सब पूर्वजन्मों के कर्मों से भी तय होता है कि ईश्वर की कृपादृष्टि में समय कितना लगना है. घड़े की तरह परीक्षा की अवधि में जो सत्यपथ पर टिका रहता है वह अपना जीवन सफल कर लेता है !
Radha Soami Ji.....

मृत्यु की तैयारी। Maut ki tyari - Radha soami sakhi


गुरु नानक जी के पास सतसंग में एक छोटा लड़का प्रतिदिन आकर बैठ जाता था।
एक दिन नानक जी ने उससे पूछाः- “बेटा, कार्तिक के महीने में सुबह इतनी जल्दी आ जाता है, क्यों?”
वह छोटा लड़का बोलाः- “महाराज, क्या पता कब मौत आकर ले जाये?”
नानक जीः- “इतनी छोटी-सी उम्र का लड़का, अभी तुझे मौत थोड़े मारेगी?
अभी तो तू जवान होगा, बूढ़ा होगा, फिर मौत आयेगी।
लड़का बोलाः- “महाराज, मेरी माँ चूल्हा जला रही थी, बड़ी-बड़ी लकड़ियों को आग ने नहीं पकड़ा तो फिर उन्होंने मुझसे छोटी-छोटी लकड़ियाँ मँगवायी।
माँ ने छोटी-छोटी लकड़ियाँ डालीं तो उन्हें आग ने जल्दी पकड़ लिया।
इसी तरह हो सकता है मुझे भी छोटी उम्र में ही मृत्यु पकड़ ले, इसीलिए मैं अभी से सतसंग में आ जाता हूँ।”
इसलिए जल्दी से परमात्मा से प्रेम करके जीवन सफल बना लो इन स्वांसो से बडा दगाबाज कोइ नही है, कहीं बाद मे पछताना ना पडे 

Jo hai uska Shukar kro - Radha soami sakhi

एक भिखारी भूख – प्यास से त्रस्त
होकर
आत्महत्या की योजना बना रहा था ,
तभी वहां से
एक नेत्रहीन महात्मा गुजरे
| भिखारी ने उन्हें अपने मन
की व्यथा सुनाई
और कहा , ” मैं अपनी गरीबी से तंग
आकर
आत्महत्या करना चाहता हूँ |”
उसकी बात सुन महात्मा हँसे और
बोले , “ठीक
है, आत्महत्या करो लेकिन पहले
अपनी एक आंख
मुझे दे दो | मैं तुम्हे एक हज़ार
अशरफिया दूंगा | ” भिखारी चोंका |
उसने कहा ,
“आप कैसी बात करते हैं | मैं आंख
कैसे दे
सकता हूँ |”
महात्मा बोले, “आंख न सही , एक हाथ
ही दे दो ,
मैं तुम्हे एक हज़ार
अशरफिया दूंगा | ”
भिखारी असमंजस में पड़ गया |
महात्मा मुस्कराते हुए बोले, संसार
में सबसे
बड़ा धन निरोगी काया है | तुम्हारे
हाथ-पाव ठीक
है, शारीर स्वस्थ है, तुमसे
बड़ा धनी और कौन हो सकता है |
तुमसे गरीब
तो में हूँ कि मेरी आँखें नहीं हैं
मगर में
तो कभी आत्महत्या के बारे में
नहीं सोचता | भिखारी ने उनसे
छमा मांगी और
संकल्प किया कि वह कोई काम करके
जीवन-
यापन करेगा |

अल्लाह की मर्जी । Allah Ki marji Sakhi


एक बादशाह था, वह जब नमाज़ के लिए मस्जिद जाता, तो 2 फ़क़ीर उसके दाएं और बाएं बैठा करते!
दाईं तरफ़ वाला कहता: “या अल्लाह! तूने बादशाह को बहुत कुछ दिया है, मुझे भी दे दे!”
बाईं तरफ़ वाला कहता: “ऐ बादशाह!अल्लाह ने तुझे बहुत कुछ दिया है, मुझे भी कुछ दे दे!”  
दाईं तरफ़ वाला फ़क़ीर बाईं तरफ़ वाले से कहता: “अल्लाह से माँग! बेशक वह सबसे बैहतर सुनने वाला है!”
बाईं तरफ़ वाला जवाब देता: “चुप कर बेवक़ूफ़ ”एक बार बादशाह ने अपने वज़ीर को बुलाया और कहा कि मस्जिद में दाईं तरफ जो फ़क़ीर बैठता है वह हमेशा अल्लाह से मांगता है तो बेशक अल्लाह उसकी ज़रूर सुनेगा, लेकिन जो बाईं तरफ बैठता है वह हमेशा मुझसे फ़रियाद करता रहता है, तो तुम ऐसा करो कि एक बड़े से बर्तन में खीर भर के उसमें अशर्फियाँ डाल दो और वह उसको दे आओ!

वज़ीर ने ऐसा ही किया…
अब वह फ़क़ीर मज़े से खीर खाते- खाते दूसरे फ़क़ीर को चिड़ाता हुआ बोला: “हुह… बड़ा आया  ‘अल्लाह देगा…’ वाला,  यह देख बादशाह से माँगा,  मिल गया ना? ”
खाने के बाद जब इसका पेट भर गया तो इसने खीर से भरा बर्तन उस दूसरे फ़क़ीर को दे दिया और कहा: “ले पकड़… तू भी खाले,  बेवक़ूफ़
अगले दिन जब बादशाह नमाज़ के लिए मस्जिद आया तो देखा कि बाईं तरफ वाला फ़क़ीर तो आज भी वैसे ही बैठा है लेकिन दाईं तरफ वाला ग़ायब है!
बादशाह नें चौंक कर उससे पूछा: “क्या तुझे खीर से भरा बर्तन नहीं मिला? ”फ़क़ीर: “जी मिला ना बादशाह सलामत, क्या लज़ीज़ खीर थी,  मैंने ख़ूब पेट भर कर खायी!”
बादशाह: “फिर?
”फ़क़ीर: “फ़िर वह जो दूसरा फ़क़ीर यहाँ बैठता है मैंने उसको देदी, बेवक़ूफ़ हमेशा कहता रहता है: ‘अल्लाह देगा, अल्लाह देगा!
’बादशाह मुस्कुरा कर बोला: “बेशक, अल्लाह ने उसे दे दिया!
        ”इसी तरह हमें भी उस कुल मालिक से ही अरदास करनी चाहिए॥ राधा स्वामी जी ॥

कर्मों का फल । Karmon Ka Fal

एक बार धृतराष्ट्र  ने श्री कृष्ण जी से पूछा, " हे
भगवन, मुझे अपने 100 जन्मों तक का ज्ञात है, मैन ऐसा कोई कर्म नही किया कि मैं अंधा होउ। फिर मैं अंधा क्यों हु। कृपया मेरी समस्या का निवारण करें।
श्री कृष्ण बोले, "हे राजन, तुम्हे अपने 100 जन्मो का ज्ञात है, पर तुमने अपने 101 वें जन्म में कुछ ऐसा कर्म किया था कि तुम अंधे पैदा हुए।
धृतराष्ट्र बोले, " मुझे बताये भगवन मैने ऐसा क्या किया कि मैं अंधा पैदा हुआ।
श्री कृष्ण ने उनपे कृपा करके उन्हें उनके 101 वें जन्म में ले गए।
वहां धृतराष्ट्र देखते है कि वो जब एक बच्चे थे तब उन्होंने मजे के लिए एक कीड़े की आंख में तिनका मारकर उसे घायल करदिया। वो कीड़ा तड़प रहा था और वो मजे से हंस रहे थे।
ये सब देखकर धृतराष्ट्र बोले, " मैं समझ गया भगवन, किये हुए कर्म भुगतने पड़ेंगे।
हमारे कर्म ऐसी चीज होती है जो हमारा कभी पीछा नही छोड़ते। भजन सिमरन करने से कर्म कटते नही। बल्कि उनका बोझ हल्का हो जाता है। मालिक पे विश्वास होने से वो सारे कर्म हल्के लगने लगते है।
"इसलिए कहते है भगवान से मत डरो तो चलेगा। पर अपने कर्मों से जरूर डरना। क्योंकि किये हुए कर्मों का फल तो भगवान को भी भुगतना पड़ेगा।"
अच्छे कर्म करो और भजन करो
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रूहानियत या कुछ और

रूहानियत या कुछ और


एक बार एक संत घर से रूहानियत की तलाश में निकला। वह अपना सब कुछ त्याग कर बरसों घोर तप करता रहा।
एक दिन वो अपनी तपस्या में मगन था। ऊपर चिड़ियाँ जोर जोर से चहक रही थी। उस संत का ध्यान भटकाने लगा।
चिड़ियों का चहकना बंद नहीं हुआ।
संत गुस्से से उठकर बोला, "जाओ मर जाओ तुम सब"
और ये क्या उसके इतना बोलते ही सभी चिड़ियाँ जमीन पर गिर गयी।
वो बहुत खुश हुआ कि आखिर मेरी तपस्या सफल हुई।
वो घर की तरफ चल पड़ा।
चलते चलते वो एक गांव में पहुंचा जहां एक औरत कुएं में से पानी निकाल कर अपने पैरों पर डाल रही थी।
वो बोला "मुझे पानी पिलाओ"
औरत ने अनसुना करके पानी डालना जारी रखा।
वो फिर बोला" तुम मुझे जानती नहीं मैं कोन हु"
औरत बोली, " मैं जानती हूं तुम जो चिड़ियाँ मार कर आये हो जंगल में"

वो सकपका गया कि इसे कैसे पता चली जंगल वाली बात
वो हैरान होकर पूछा कि तुम्हें कैसे पता चला।
वो बोली ," तुम जो सिद्धि बरसों की तपस्या से हासिल करके आये हो वो मैंने रातों रात हासिल की है।

वो और चकराया की जो सिद्धि मैंने बरसों का हठ कर्म करके हासिल की है वो इसने रातों रात कैसे हासिल करली।

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वो बोला " हे माते, आप मुझे बताएं कि ये आपने रातों रात कैसे हासिल की"?

वो बोली, " तो सुनो, मेरी नई नई शादी हुई थी। मुझे रात को सपना आया कि मेरे पति ने पानी मांगा है। मैं आधी रात कुएं से पानी भरके सुबह तक उनके तकिये के पास खड़ी रही। उस मालिक ने मेरी कर्मठता देखकर मुझे इस सिद्धि से नवाजा।"

वो बोला," तो तुम पैरों पे पानी क्यों डाल रही थी ?

औरत बोली," मेरी बहन के घर मे आग लगी है, उसे ही बुझा रही हु।

उसने अपनी सिद्धि से देखा कि सचमें उसकी बहन के घर आग लगी थी जो अब बुझ चुकी थी।

वो बोली," क्या तुम्हारा लक्ष्य सिर्फ इस सिद्धि को पाना था ?

वो बोला," नहीं"

औरत बोली," तो किसी पूर्ण सतगुरु से नाम का भेद लो और कमाई करो"

हमें असली नाम ले भेद किसी पूरण संत सतगुरु से ही मिल सकता है। और मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है।
राधा स्वामी जी

मेहरबान है साहिब मेरा

कुछ समय पहले की बात है, सेवा के जत्थे (Group) लंगर की सेवा के लिए ब्यास पहुँच चुके थे, बाबा जी उनको दर्शन देने के लिए गए, थोड़ी सी दूरी पर एक अकेला भाई खड़ा दोनों हाथ जोड़ के खड़ा था, जैसे वो लंगर की सेवा करने के लिए तरस रहा हो, बाबा जी ने उसे देखा और फिर एक जत्थे (Group) से पूछा कि क्या वो भाई उनके साथ आया है? उन्होंने मना कर दिया ।
फिर बाबा जी ने दूसरे जत्थे से पूछा, उन्होंने ने भी मना कर दिया, इसी तरह से सभी जत्थों ने मना कर दिया, तब बाबा जी ने फ़रमाया कि अगर हम इसे अपने साथ ले लें तो किसी की कोई ऐतराज़ तो नहीं है, सबने कहा कि नहीं
बाबा जी ने सेवादारों से कहा कि इस भले आदमी को मेरी कोठी में ले आओ, सेवादार उसे बाबा जी कोठी में ले गए, वो आदमी रो रहा था और सोच रहा था की कहीं उस से कोई गल्ती तो नहीं हो गयी?
जब बाबाजी उससे मिले तो बाबा जी ने पूछा कि क्या लंगर की सेवा की चाहत है? तो वो बोला कि हाँ जी है, बाबा जी ने पूछा कि क्या करते हो? तो वो बोलता है कि मैं अकेला हूँ, कोई नहीं है इसलिए मैं तो हमेशा लंगर की सेवा कर सकता हूँ, बाबा जी ने उसे अपने गले से लगाया और सेवादारों को बुला के कहा कि आज से हमारा खाना ये बनायेंगे, वो बोला कि जी खाना बनाना तो मुझे आता ही नहीं, तो बाबा जी बोलते हैं की कोई बात नहीं हम सिखायेंगे
तो उस दिन से वो बाबा जी के लिए खाना बनाने लगा, एक दिन बाबा जी ने देखा की वो दस्ताने पहन के खाना बना रहा है तो उसको बोलते हैं कि मुझे खाना बिना दस्तानो के बना कर दो, मालिक की इतनी कृपा हुई उस पर कि बाबा जी जहाँ भी जाते है, उसे अपने साथ लेकर जाते हैं और उसके हाथ से बना खाना ही खाते हैं
मेहरबान है साहिब मेरा !!!
जिसका कोई नहीं होता उसका सतगुरु होता है

डेरा ब्यास question answer 27-05-2017


                              


डेरा ब्यास question answer 27-05-2017

1. लड़का- बाबाजी क्या मुक्ति के लिए नाम दान लेना जरूरी है
बाबाजी - नहीं बेटा। ऐसा बिल्कुल भी नही है। अगर दिल मे प्रेम और बिरह है तो मालिक जरूर बख्शीश करेंगे।
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2. लड़का - बाबाजी मैं engineering और medical में से किसी एक को चुनना चाहता हूं और मैं दोनों में अच्छा हु। क्या करूँ
बाबाजी - अकड़ बकड बंबे बो। असी नबे पूरे सो। (संगत में जोरदार ठहाका) 
लड़का - बाबाजी हेल्प कीजिये न
बाबाजी- तू ऐसा कर आधा इंजीनियर बनजा और आधा डॉक्टर। डॉक्टर बनके टांग काट देना और इंजीनियर बनके नई लगा देना। (संगत जोर से हँसने लगी)
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3. लड़की ( रोते हुए) - बाबाजी मेरे से गलती हो गयी है। क्या आप मुझे माफ़ करदोगे।
बाबाजी - बेटा अगर गलती हुई है तो उसका फल तो भुगतना ही पड़ेगा।
लड़की( और रोते हुए) - बाबाजी फिर मैं क्या करूँ की आप माफ करदोगे
बाबाजी - बेटा अपनी गलतियों से सीखो। अगर दुबारा वही गलती करोगे तो दुगना फल भुगतना पड़ेगा।
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4. लड़की - बाबाजी मेरा रिजल्ट आने वाला है। किरपा करना
बाबाजी - मुस्कुराते हुए, बेटा मिलेगा तो वही जो लिखा होगा
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5. लड़का- बाबाजी मैं ऐसा क्या करूँ की अपना ख्याल बार बार आये।
बाबाजी - शादी करले। जब बीवी तंग क
रेगी तो बार बार बाबाजी को याद करेगा ( संगत में जोरदार ठहाका)

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6. लड़की - बाबाजी हमारे वहां एक अंकल है। वो सेवा करते है उनकी ड्यूटी पहले वहां थी अब वहां हो गयी
बाबाजी (टोकते हुए) - बेटा हमे किसी administration या व्यक्ति विशेष का नाम नही लेना है। सिर्फ परमार्थ की बात करनी है।
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7. लड़का - बाबाजी जिन्होंने नाम दान नही लिया क्या आप उनकी संभाल करेंगे।
बाबाजी - बेटा संभाल और नाम दान का कोई संबंध नही है। जो प्रेम करता है उसकी संभाल होगी।
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8. लड़की - बाबाजी जब कोई मर जाता है तो क्या वो तारा बन जाता है।
बाबाजी - नहीं बेटा, ये सब तो हमे समझाने के लिए है। जो मर जाता है या तो इसी चोरासी में आ जाता है या फिर परमात्मा में विलीन हो जाता है। ये नही की वो चाँद या तारा बन जाता है।
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9. लड़का - बाबाजी किस्मत और मेहनत का क्या संबंध है
बाबाजी - बेटा मेहनत करोगे तो उस मुकाम तक पहुंच जाओगे जहाँसे किस्मत तुम्हे ढूंढ सके। बिना किस्मत के भी सारी मेहनत बेकार है। पर इसका ये मतलब नही की सब किस्मत के भरोसे छोड़ देना चाहिए।
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10. लड़की - बाबाजी आप सभी को एक एक करके क्यों ले जाते हो। सबको एक साथ क्यों नही ले जाते (संगत जोर से हँसने लगी)
बाबजी- अरे बाबा ने कोई जहाज थोड़ी लेके रखा है जो सबको साथ ले जाये।
और अगर ले भी गए तो पता है कितना सूना सूना हो जाएगा सब कुछ (संगत फिर से हँसने लगी)

**शेयर करें सबके साथ**
राधा स्वामी जी