लाहौर के लड़के की साखी



लाहौर के लड़के की साखी…
एक लाहौर का लड़का था,सत्संगी तथा प्रेमी जीव था। बरमा गया हुआ था,जब वर्मा की लड़ाई शुरू हुई तो सतगुरु का ध्यान लगाने लगा। उस समय जहाज के टिकट नहीं मिलते थे।सतगुरु ने दर्शन दिए। कहा- “तू चल, टिकट मिल जायेगा पर जब दो जहाज निकल जायेगे तब तीसरे में बैठना। वह चल पड़ा, बेचारा जब पहुचा तो जहाज तैयार था टिकट मिल गया। जब चढ़ने लगा तो हजूर एक अगे्ज के रूप में आकर कहने लगे – देखो इस में मत बैठो,इस में जगह नहीं हैं।मन बुरी के बसा था, कहने लगा- साहिब इस में जगह है।लेकिन फिर भी उन्होंने उस में नहीं बैठने दिया।इस के बाद दूसरा जहाज आ गया।उस में भी एक फौजी अफसर के रूप में प्रकट हो कर उस के बहुत जोर लगाने पर भी नही बैठने दिया। जब तीसरा जहाज आया तो कहने लगे बैठ जा ठीक से पहुंच जाएगा कोई तकलीफ नहीं होगी। जब मैं जहाज में बैठ गया तो नीद आ गई स्वप्न में सतगुरु ने दर्शन दिए और कहा -देखो मैने जो किया तुम्हारे भले के लिए किया।तुझेअभी पता चल जाएगा वह दोनों जहाज डूब जाने हैं। थोड़ा सा डालेगा तो यह भी लेकिन सही सलामत जायेगा, तुम घबराना मत। तभी थोड़ी देर पश्चात मालूम हुआ कि जो पहले दो जहाज गये थे वह दोनों डूब गये हैं। उन दोनों जहाजों का पता भी नहीं चला। मैं बहुत हैरान हुआ। इतने में हमारा जहाज भी डोलने लगा, सब बहुत घबराये मै चुपचाप सतगुरु का ध्यान करके बैठा रहा। सतगुरु ने दर्शन दिए कहने लगे जब अगे्ज फौजी अफसर

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बनकर बचाया तो अब क्यों न बचाएगा,तुम चुपचाप बैठे रहो। मुझे चुपचाप बैठा देख सब कहने लगे – मेरा बचाने वाला मेरे साथ है। इतने जहाज ठीक हो गया, हम राजी खुशी किनारे लग गए। उस लड़के ने भण्डारे के बडे सत्संग में सारा हाल वर्णन किया -धन्य सच्चे बादशाह, देखने को तो मनुष्य मालूम होते हैं। हम नहीं समझ सकते जो आप है- मुझे तो हजूर आप ही ले आए है,वरना मैं तो नहीं आ सकता था, धन्य सतगुरु सच्चे शहंशाह। हजूर ने कहा देख काका मैं तो कुछ भी नहीं हूं सब वाहेगुरू के खेल है,जो कुछ हुआ है,तेरे प्यार और भरोसे ने किया है। मैं साधु संत का सेवादार हूँ। शुक्र है जो सच्चे बादशाह ने मुझे सेवा बख्शी है।धन्य सतगुरु सच्चे बादशाह दीन दुनिया के भली होकर फिर सेवादार ही बने रहे हम मूर्खों को सबक सिखा गये।
सभी प्यारे सतसंगी भाई बहनों और दोस्तों को हाथ जोड़ कर प्यार भरी राधा सवामी जी..
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